वकील की गलती की सजा मुवक्किल को नहीं: राजस्थान हाइकोर्ट ने 25 पेड़ लगाने की शर्त पर बहाल किया पुराना मामला

Jan 20, 2026 - 12:47
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वकील की गलती की सजा मुवक्किल को नहीं: राजस्थान हाइकोर्ट ने 25 पेड़ लगाने की शर्त पर बहाल किया पुराना मामला

जयपुर (कमलेश जैन) राजस्थान हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए कहा कि वकील द्वारा सुनवाई की अगली तारीख नोट करने में हुई मानवीय भूल के लिए मुवक्किल को प्रताड़ित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने तकनीकी आधार पर मामले को बहाल करने से इनकार करने वाले ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड की पीठ ने न केवल मामले को दोबारा शुरू करने का आदेश दिया, बल्कि याचिकाकर्ता पर पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी एक अनूठी शर्त भी लगाई।
अदालत ने मामले को बहाल करने के बदले याचिकाकर्ता पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया। इसके साथ ही जस्टिस ढांड ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह किसी सार्वजनिक स्थान पर 25 छायादार पौधे लगाए। याचिकाकर्ता को इन पौधों को लगाने के प्रमाण के तौर पर उनकी तस्वीरें अदालत में पेश करनी होंगी। साथ ही एक शपथ पत्र देना होगा कि वह इन पौधों की उचित देखभाल और सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। कोर्ट का मानना है कि इस तरह के रचनात्मक दंड से समाज में सकारात्मक संदेश जाता है।
मामला
यह विवाद वर्ष 1989 में दायर बेदखली और मुनाफे से जुड़े एक मुकदमे से शुरू हुआ। इस मामले में साक्ष्य दर्ज करने के लिए एक तारीख तय की गई, जिसे याचिकाकर्ता के वकील ने गलती से गलत नोट कर लिया। वकील के उपस्थित न होने के कारण अदालत ने मामला खारिज कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने मामला बहाल करने के लिए आवेदन किया, लेकिन इसमें 30 दिनों की वैधानिक अवधि से कुछ देरी हो गई। याचिकाकर्ता का तर्क था कि वह घरेलू कार्यों के कारण शहर से बाहर था, इसलिए आवेदन में देरी हुई।
ट्रायल कोर्ट ने केवल देरी के तकनीकी आधार पर बहाली का आवेदन खारिज कर दिया। हाइकोर्ट ने इस पर अपनी राय देते हुए कहा कि आवेदन में हुई देरी बहुत अधिक नहीं थी और उसका उचित कारण भी बताया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि बेदखली जैसे गंभीर मामलों का निपटारा केवल तकनीकी खामियों के आधार पर नहीं, बल्कि मामले के गुण-दोष और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए। कोर्ट ने माना कि वकील की एक छोटी सी चूक के कारण याचिकाकर्ता को न्याय से वंचित करना सुशासन और न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
हाइकोर्ट के इस निर्णय ने यह साफ किया कि अदालतों को न्याय करते समय व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। 1989 से लंबित इस पुराने मामले को बहाल करते हुए कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि पक्षकारों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिले। अब यह मामला अपने मूल नंबर पर बहाल हो जाएगा और इस पर नए सिरे से सुनवाई शुरू होगी। इस फैसले को कानूनी हलकों में मुवक्किलों के अधिकारों की रक्षा और न्यायिक संवेदनशीलता के एक बड़े उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

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