होली से सिंधियत दिवस चेटीचंड महोत्सव तक रहती है भारी मांग, पसंद आ रहा 'सिंधी घेवर' का स्वाद
खैरथल (हीरालाल भूरानी) फाल्गुन मास की शुरुआत के साथ ही शहर के बाजारों में पारंपरिक सिंधी घेवर की खुशबू फैल गई है। मिठाई की दुकानों पर सुबह से देर रात तक कड़ाहियां चढ़ी है और कारीगर सुनहरे, जालीदार घेवर तैयार करने में जुटे हैं। होली के त्योहार पर इसकी जमकर खरीदारी हो रही है और यह सिलसिला सिंधियत दिवस चेटीचंड महोत्सव तक लगातार जारी रहता है। खैरथल का सिंधी घेवर केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि परंपरा और पारिवारिक स्नेह का प्रतीक बन चुका है।
होली पर जमकर खरीदारी
होली के अवसर पर सिंधी समाज सहित अन्य समाजों के लोग भी अपनी बहन-बेटियों को 'सामान' भेजते हैं, जिसमें सिंधी घेवर प्रमुख रूप से शामिल रहता है। इस दौरान बाजार में विशेष रौनक रहती है और प्रतिदिन किंवटल के हिसाब से घेवर की बिक्री होती है। दुकानदारों के अनुसार वर्तमान में इसकी कीमत लगभग 180 रुपए प्रति किलो है और मांग को देखते हुए अतिरिक्त कारीगर लगाए गए है।
इन प्रतिष्ठानों पर बन रहा खास घेवर
शहर के प्रमुख प्रतिष्ठान लक्ष्मी मिष्ठान भंडार पर विशेष रूप से पारंपरिक विधि से सिंधी घेवर तैयार किया जा रहा है। इन दुकानों पर ग्राहकों की लंबी कतारें देखी जा रही है। दुकानदारों के अनुसार होली के साथ-साथ चेटीचंड महोत्सव तक ऑर्डर बुकिंग लगातार चलती रहती है।
सिंधी समाज का प्रमुख पर्व
सिंधी समाज का प्रमुख पर्व चेटीचंड (सिंधियत दिवस) तक यह मिठाई बड़े पैमाने पर बनाई और बेची जाती है। इस दौरान धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी सिंधी घेवर का विशेष महत्व रहता है। लगभग 15 दिनों तक सुरक्षित रहने के कारण इसे देश के बड़े शहरों और विदेशों में बसे प्रवासी परिवारों तक कूरियर से भेजा जाता है। इस तरह खैरथल का यह पारंपरिक स्वाद "सात समंदर पार" तक अपनी पहचान बना रहा है।