जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का जन्म कल्याणक मनाया
लक्ष्मणगढ़ (अलवर/कमलेश जैन) भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ), जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर का जन्म कल्याणक दिवस चैत्र वदी नवमी को आज कस्बे स्थितिआदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में भक्ति भाव से मनाया गया ।
आज का दिन जैन समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि भगवान ऋषभदेव ने आज ही के दिन धरती पर जन्म लिया था और उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग का अनुसरण कर अनंत आत्मा के उद्धार की दिशा में पहला कदम उठाया गया।
अयोध्या में जन्मे और कैलाश पर्वत अष्टापद से मोक्ष पधारे ऐसे प्रभु ऋषभदेव का जन्म कल्याणक जैन समाज के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्वों में से एक है। भगवान आदिनाथ के जन्म से जैन धर्म को एक नया दृष्टिकोण प्राप्त हुआ, और उन्होंने जीवन के उच्चतम आदर्शों की स्थापना की।
भगवान आदिनाथ ने धर्म का प्रचार किया और जैन धर्म के सिद्धांतों को प्रस्तुत किया, जिनमें अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य जैसे नैतिक गुणों पर विशेष जोर दिया गया है। उनके जन्म कल्याणक को विशेष रूप से जैन समाज में पूजा और उपासना का दिन माना गया है, जिसमें लोग उपवासी रहते हैं और अपने जीवन में तपस्या, साधना और धार्मिक कर्मों में संलग्न रहते हैं।
जीवन परिचय: जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का जन्म चैत्र कृष्ण नौवीं के दिन सूर्योदय के समय हुआ। उन्हें ऋषभदेव जी, ऋषभनाथ भी कहा जाता है। ऋषभदेव आदिनाथ भगवान का जन्म युग के आदि में राजा नाभिराय जी के यहां पर माता मरूदेवी की कोख में हुआ था।
उन्हें जन्म से ही सम्पूर्ण शास्त्रों का ज्ञान था। वे समस्त कलाओं के ज्ञाता और सरस्वती के स्वामी थे। युवा होने पर कच्छ और महाकच्छ की दो बहनों यशस्वती (या नंदा) और सुनंदा से ऋषभनाथ का विवाह हुआ। नंदा ने भरत को जन्म दिया, जो आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट बने। उसी के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा (जैन धर्मावलंबियों की ऐसी मान्यता है)। आदिनाथ ऋषभनाथ सौ पुत्रों और ब्राह्मी तथा सुंदरी नामक दो पुत्रियों के पिता बने।
उल्लेखनीय कार्य: भगवान ऋषभनाथ ने ही विवाह-संस्था की शुरुआत की और प्रजा को पहले-पहले असि (सैनिक कार्य), मसि (लेखन कार्य), कृषि (खेती), विद्या, शिल्प (विविध वस्तुओं का निर्माण) और वाणिज्य-व्यापार के लिए प्रेरित किया। कहा जाता है कि इसके पूर्व तक प्रजा की सभी जरूरतों को क्लपवृक्ष पूरा करते थे। उनका सूत्र वाक्य था- 'कृषि करो या ऋषि बनो।'
दिगम्बर तपस्वी: ऋषभनाथ ने हजारों वर्षों तक सुखपूर्वक राज्य किया फिर राज्य को अपने पुत्रों में विभाजित करके दिगम्बर तपस्वी बन गए। उनके साथ सैकड़ों लोगों ने भी उनका अनुसरण किया। जब कभी वे भिक्षा मांगने जाते, लोग उन्हें सोना, चांदी, हीरे, रत्न, आभूषण आदि देते थे, लेकिन भोजन कोई नहीं देता था। इस प्रकार, उनके बहुत से अनुयायी भूख बर्दाश्त न कर सके और उन्होंने अपने अलग समूह बनाने प्रारंभ कर दिए।
यह जैन धर्म में अनेक सम्प्रदायों की शुरुआत थी। जैन मान्यता है कि पूर्णता प्राप्त करने से पूर्व तक तीर्थंकर मौन रहते हैं। अत: आदिनाथ को एक वर्ष तक भूखे रहना पड़ा। इसके बाद वे अपने पौत्र श्रेयांश के राज्य हस्तिनापुर पहुंचे। श्रेयांस ने उन्हें गन्ने का रस भेंट किया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। वह दिन आज भी 'अक्षय तृतीया' के नाम से प्रसिद्ध है। इसी के तहत आज भी हस्तिनापुर में जैन धर्मावलंबी इस दिन गन्ने का रस पीकर अपना उपवास तोड़ते हैं।
कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति और समाधि: इस प्रकार, एक हजार वर्ष तक कठोर तप करके ऋषभनाथ को कैवल्य ज्ञान (भूत, भविष्य और वर्तमान का संपूर्ण ज्ञान) प्राप्त हुआ। वे जिनेन्द्र बन गए। पूर्णता प्राप्त करके उन्होंने अपना मौन व्रत तोड़ा और संपूर्ण आर्यखंड में लगभग 99 हजार वर्ष तक धर्म-विहार किया और लोगों को उनके कर्तव्य और जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति पाने के उपाय बताए। अपनी आयु के 14 दिन शेष रहने पर भगवान ऋषभनाथ हिमालय पर्वत के कैलाश शिखर पर समाधिलीन हो गए। वहीं माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन उन्होंने निर्वाण यानी मोक्ष प्राप्त किया। यह पर्व खासतौर पर देश के जैन मंदिरों में बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है,
इसी श्रृंखला में आज लक्ष्मणगढ़ में विशेष पूजा, अर्चना और शांति धारा अभिषेक कार्यक्रम आयोजित किया गया। विशेष पूजा अर्चना के पुण्यार्जक लोकेश जैन मोंटू जैन धीरज जैन आदि रहे । शाम 6:30 बजे कलश अभिषेक का आयोजन किया गया । भगवान आदिनाथ की पूजा अर्चना करने से आत्मा को शांति मिलती है और उनके बताए मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।
इस मौके पर जैन मंदिर में जैन समाज के अधिकांश महिला पुरुष मौजूद रहे