गणगौर उत्सवः पुष्करणा ब्राह्मण समाज ने शहर में बेडला सवारी निकाली, नगर भ्रमण भी किया
खैरथल (हीरालाल भूरानी)
शहर में सनातन परंपराओं की जीवंत झलक उस समय देखने को मिली जब पुष्करणा ब्राह्मण समाज द्वारा पारंपरिक गणगौर उत्सव के तहत बेड़ला सवारी सहित अन्य धार्मिक आयोजन आयोजित किए गए। महिलाओं ने सिर पर घड़े रखकर नगर भ्रमण किया और मंगल गीतों के साथ माता गौरी की आराधना की। धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का यह अनूठा आयोजन नगरवासियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा।
समाज के लोगों ने पुरानी आबादी में अर्जुन आचार्य व पवन आचार्य के निवास पर पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ गणगौर की स्थापना की। वहीं ईशर की स्थापना प्रकाश दादानी व सौरव दादानी के घर की जाएगी। समाज के दीपक मांधु व सोनू लोढ़ा ने बताया कि अष्टमी और दशमी के अवसर पर महिलाओं ने व्रत रखकर माता गौरी की पूजा-अर्चना की।
बेड़ला कलश यात्रा बनी आकर्षण का केंद्र:
गणगौर उत्सव के दौरान चतुर्थी, अष्टमी और दशमी पर बेड़ला कलश यात्रा निकाली गई। इसमें महिलाएं सिर पर एक के ऊपर एक सात घड़े रखकर नगर के प्रमुख मागों से होती हुई विभिन्न मंदिरों तक पहुंचीं। वहां पूजा-अर्चना कर पवित्र जल का संग्रह किया गया और पुनः घर लौटकर गणगौर की पूजा की। समाज के पूर्व अध्यक्ष ओमप्रकाश मांधू ने बताया कि पहले यह पवित्र जल कुओं से लाया जाता था, लेकिन अब कुएं समाप्त होने के कारण मंदिरों से जल एकत्रित किया जाता है। उत्सव के तहत 21 मार्च को पारंपरिक फेरे लिए जाएंगे। इसके अगले दिन मंगल गीतों के साथ गणगौर, ईशर जी, महादेव और पार्वती की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा। इससे पहले नगर में शोभायात्रा और नगर भ्रमण आयोजित होगा।
1 क्विंटल बाजरे के आटे, 45 किलो देसी घी और 35 किलो चीनी पाउडर से बनेगा प्रसाद
समारोह के समापन पर कुल्लर प्रसाद वितरित करने की विशेष परंपरा निभाई जाएगी। इसके लिए करीब 1 क्विंटल बाजरे का आटा, 45 किलो देसी घी और 35 किलो चीनी पाउडर से प्रसाद तैयार किया जाएगा, जिसे समाज के प्रत्येक घर में वितरित किया जाएगा। समाज के राज आचार्य ने बताया कि यह परंपरा बंटवारे से पहले पाकिस्तान के सिंध प्रांत से चली आ रही है, आज भी समाज इसे पूरी श्रद्धा से निभा रहा है। गणगौर स्थापना के साथ कच्ची मिट्टी के घड़े में देसी घी से अखंड ज्योत प्रज्वलित की जाती है, जो लगातार 16 दिन तक जलती रहती है। इस दौरान समाज की महिलाएं घर-घर जाकर ज्योत के दर्शन करवाती हैं। श्रद्धालु देसी घी और दक्षिणा अर्पित कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। समापन के बाद कच्चे घड़े के टुकड़ों को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है, जिन्हें लोग अपने अनाज में रखते हैं।