जालिया गाँव में 290 दिन से आंदोलन उबाल पर, जिंदल कंपनी के खिलाफ किसानों का गुस्सा फूटा; प्रशासन पर गंभीर आरोप—'लिखित समझौता अब तक लागू नहीं'
भीलवाड़ा (बृजेश शर्मा) जालिया गाँव में किसानों का आंदोलन मंगलवार को 290वें दिन भी जारी है और अब यह एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। इससे पहले भी किसान 205 दिनों तक धरने पर बैठे रहे थे। उस समय तात्कालीन अतिरिक्त जिला कलेक्टर ओ.पी. मेहरा, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पारस जैन, तथा सैकड़ों पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में, जिंदल कंपनी के अधिकारियों के साथ चार घंटे लम्बी वार्ता के बाद एक लिखित समझौता हुआ था—वह भी जिंदल कंपनी के लेटरपैड पर।
प्रशासन ने किसानों से वादा किया था कि समझौते को 7 दिनों में लागू किया जाएगा, अन्यथा लापिया पॉइंट फिर से बंद कर दिया जाएगा। लेकिन न तो समझौते का पालन हुआ और न ही डीजीएमएस के आदेशों की पालना की गई।
कंपनी पर अवैध ब्लास्टिंग का आरोप : गाँव में दहशत का माहौल
किसानों का आरोप है कि डीजीएमएस ने 34 मिमी गहराई व 2–3 किलो बारूद की अनुमति दी है, लेकिन जिंदल कंपनी 125 मिमी चौड़ाई व 50–60 किलो बारूद तक भरकर ब्लास्टिंग कर रही है, जो पूरी तरह अवैध है। इससे— कई मकान दरक गए, कुछ ढह गए, खेतों में काम कर रही महिलाएँ और मजदूर घायल भी हो चुके हैं। गाँव में दहशत का माहौल है और किसान इस खतरे को अपनी जिंदगी के साथ खिलवाड़ बता रहे हैं।
पत्थरगड़ी के दौरान किसानों का फूटा गुस्सा
पत्थरगड़ी प्रक्रिया के लिए पहुँचे पटवारी कंजन शर्मा, गिरदावर कैलाश चंद तेली और जिंदल कंपनी के अधिकारियों को किसानों ने कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।
किसानों ने जोरदार नारेबाजी की और आरोप लगाया—हमारे खसरे जानबूझकर छोटे किए गए,जिंदल को लाभ पहुँचाने के लिए कागजी हेरफेर की गई, खसरे तुरंत ठीक किए जाएँ और उनकी शुद्धि की जाए।
किसानों की मांग है कि जब तक पुराना लिखित समझौता लागू नहीं होता, तब तक पत्थरगड़ी की प्रक्रिया रद्द की जाए।
किसान बोले – “हम आत्महत्या पर मजबूर, जिम्मेदार सरकार होगी”
किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो वे आत्महत्या के लिए विवश हो सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा—
“हमारी मौत की जिम्मेदारी एचडीएम, तहसीलदार, जिला कलेक्टर और राज्य सरकार की होगी।”
290 दिन बाद भी सरकार क्यों खामोश? उठे ग्रामीणों ने पूछा कि—
- क्या सरकार जिंदल कंपनी के सामने नतमस्तक है?
- क्या किसी बड़े नेता या जनप्रतिनिधि का संरक्षण कंपनी को प्राप्त है?
किसानों की पीड़ा सरकार को क्यों नहीं दिख रही?
किसानों का आरोप है कि सरकार की उदासीनता ने हालात को और बिगाड़ दिया है। किसान बोले— अब सरकार तुरंत हस्तक्षेप करे, किसानों ने फिर एक बार मांग दोहराई कि—
- समझौते को लागू किया जाए,
- अवैध ब्लास्टिंग तुरंत रोकी जाए,
- खसरा त्रुटियों को ठीक किया जाए,और किसानों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। अन्यथा गाँव की स्थिति किसी भी समय भयावह रूप ले सकती है।


