मत कर माया रो अभिमान, मत कर काया रो अहंकार, काया गार हो जासी भजन संध्या: पद्मश्री प्रहलाद सिंह टिपानिया ने गाए कबीर भजन

Apr 3, 2026 - 16:45
 0
मत कर माया रो अभिमान, मत कर काया रो अहंकार, काया गार हो जासी भजन संध्या: पद्मश्री प्रहलाद सिंह टिपानिया ने गाए कबीर भजन

उदयपुर,गोगुंदा (मुकेश मेनारिया)  30 मार्च को भीलवाड़ा के झरणा महादेव तीर्थस्थल पर स्थित बाबा रामदेव मंदिर से आरंभ हुई महामेघ धर्म जागरण यात्रा भीलवाड़ा, राजसमंद व पाली जिले में विभिन्न संतों की धूणियों पर होते हुए गुरूवार को शाम को सायरा ब्लॉक के पलासमा गांव के समीप स्थित जरगाजी नया स्थान तीर्थस्थल पर पहुंची, जहां जरगाजी विकास ट्रस्ट की अगुवाई में मेघवाल समाज के लोगों ने बाबा रामदेवजी की सेवा, यात्रा की अगुवाई कर रहे लेखक व पत्रकार भंवर मेघवंशी, मालजी का खेड़ा धूनी के संत लच्छीराम महाराज सहित यात्रियों का भव्य स्वागत किया। 
इसके बाद सम्मान समारोह आयोजित किया गया, जिसमें यात्रा के साथ आए जेबीआर ग्रुप के पूर्व अध्यक्ष भोजाराम सालवी, सालवी समाज मातृकुंडिया ट्रस्ट के अध्यक्ष लीलाधर सालवी, सालवी विकास संस्थान के अध्यक्ष दयाराम सालवी, अध्यापक नारायण लाल सालवी, अध्यापक लक्ष्मी लाल सालवी, वीडीओ नारायण सालवी, डेलास सरपंच सुरेश सालवी, देबी लाल मेघवंशी, परमानंद सालवी, लादू लाल सोनवा, बालू लाल मेघवंशी, नारायण मेघवंशी, भोमसा गोयल, पत्रकार सुरेश मेघवंशी, रामचंद्र सालवी,  सहित कई संतों, साहित्यकारों, पत्रकारों, लेखकों व भामाशाहों का सम्मान कर उन्हें अभिनंदन पत्र प्रदान किए। समारोह को संबोधित करते हुए पत्रकार व लेखक भंवर मेघवंशी ने कहा कि समाज में जागरूकता फैलाने, आपसी एकता को मजबूत करने, शिक्षा के महत्व को स्थापित करने, परंपरागत सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण करने, धार्मिक स्थलों को जोड़ने व एकता स्थापित करने सहित सामाजिक समता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से यह यात्रा निकाली गई। ट्रस्ट के उपाध्यक्ष नाना लाल मेघवाल ने जरगाजी व रघुनाथ पीर (राघु पीर) की जीवनी तथा जरगाजी तीर्थस्थल के बारे में विस्तार से बताते हुए इनसे जुड़े हुए तथ्यों से यात्रियों को अवगत कराया। 

इस दौरान ट्रस्ट अध्यक्ष गुलाबचंद मेघवाल, उपाध्यक्ष वेणीराम मेघवाल, उपाध्यक्ष सुरेश मेघवाल, मोहन लाल मेघवाल, कोषाध्यक्ष गुलाबचंद मेघवाल, बंशी लाल मेघवाल, पूर्व अध्यक्ष पूनाराम मेघवाल, नेमराज मेघवाल, मुकेश मेघवाल, राज कुमार मेघवाल, सुंदर मेघवाल, सोहन लाल मेघवाल, गणपत मेघवाल व मोहन लाल मेघवाल सहित मेघवाल समाज के कई प्रबुद्धजन मौजूद थे।

अरावली की वादी में गुंजी कबीर की वाणियां
रात 8 बजे जरगाजी के समाधि स्थल व गंगाकुड़ के पास तैयार किए गए प्रांगण में भजन संध्या आरंभ की गई, जिसमें मेवाड़, मेवाड़, मगरा, बोराट और मारवाड़ क्षेत्र से आए हजारों श्रद्धालु मौजूद थे। कबीर भजन गायक पद्मश्री प्रहलाद सिंह टिपानिया ने ‘‘सकल हंस में राम बिराजे’’ और ‘‘मत कर माया रो अभिमान, मत कर काया को अहंकार, काया गार हो जासाी’’ भजन गाए तो श्रोताओं की तालियों की गड़गड़ाहट से जरगाजी पर्वत गुंजायमान हो गया। टिपानिया ने ‘‘गणा दिन सो लियो रे, अब तू जाग मुसाफिर जाग’’, ‘‘हमें साहिब से मिलना है’’, ‘‘कहां से आए कहां जाओगे, खबर करो अपने तन की’’, ‘‘जरा हलके गाड़ी हांको मेरे राम गाड़ी वाले’’ जैसे कई भजन सुनाए। इस बीच उन्होंने कबीर भजनों के सार भी बताए। 

ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है जरगाजी तीर्थस्थल, कई संतों की तप साधना
उल्लेखनीय है कि जरगाजी के नाम से दो तीर्थस्थल है। राजस्थान की चौथे नंबर के सबसे ऊंचे पहाड़ के पूर्व दिशा में गुंदाली गांव के समीप जूना स्थान है, जहां अलख धणी ने जरगाजी को दशर्न दिए थे। वहीं पहाड़ के पश्चिम दिशा में पलासमा की ओर नया स्थान है, जहां जरगाजी ने साधना की और यहीं पर जीवित समाधी ली। यहां संत जोग रिख, पद्मा रिख, जीवनदास, केवलदास, मोना रिख, ओघड़दास, भावदास, गुलाबदास, केसूदास, शंकरदास, मोहनदास व प्रेमदास सहित कई संतों ने तप साधना की थी।

संत जरगाजी का जन्म सायरा क्षेत्र के गायफल गांव के जोग रिख वागोणा व माता रंगी बाई मेघवाल के यहां सन् 93 (ज्येष्ठ सुदी बीज, शनिवार) को हुआ था। वे बाल्यकाल से ही आध्यात्मिक प्रवृति के थे। उनका विवाह राजसमंद के काकरवा की हीमी बाई से तय किया गया था। उनकी बारात काकरवा गई लेकिन वहाँ जरगाजी ने हिमी बाई से विवाह करने की बजाय उन्हें अपनी धर्म बहन बना लिया। फाल्गुन बदी चौदस को नरवर के जंगल में आते समय उन्हें अलख धणी से साक्षात्कार हुआ। किवदंती है कि अलख धणी ने उन्हें अपने घोड़े की लगाम थमाकर रखवाली करने को कहा। अलख धणी 12 साल बाद वापस लौटे तो देखा कि जरगाजी उनके घोड़े को पकड़कर खड़े थे। जरगाजी के समर्पण को देखकर उन्होंने वरदान मांगने को कहा। तब जरगा जी ने कहा कि ‘‘धोप धणियो री, नाम जरगा रो।’’ मतलब यह धाम अलख धणी की रहे और नाम जरगा का रहे। तब से नरवर के पहाड़ का नाम जरगा पड़ा। कुछ समय बाद जरगाजी वहां से पहाड़ी के पार पश्चिम दिशा में पलासमा के समीप अरावली की तलहटी में अपना नया तप स्थल बनाया। यहीं पर जरगाजी ने जीवित समाधी ली। तब से समाधी पर अलख के पांव की सेवा मेघवाल समाज के लोग करते आए है। इसी समाधी पर महाराणा कुम्भा ने पाषाण की छतरी का निर्माण करवाया। उनका जन्म इसी स्थान के आशीर्वाद से हुआ था। किवदंती के अनुसार महाराणा मोकल के संतान नहीं थी, जरगा जी की समाधी पर संत समागम होता था। किसी ने महाराणा मोकल को संतों का आशीर्वाद लेने को कहा, जिस पर महाराणा मोकल यहां आए और यहां संतों ने उन्हें आशीर्वाद में कलश दिया। इसके 9 माह बाद महाराणा मोकल की रानी ने पुत्र को जन्म दिया, चूंकि कलश (कुंभ) के कारण जन्म हुआ इसलिए उनका नाम कुंभा रखा गया।
कालांतर में रघुनाथ पीर नाम के संत ने यहां सूखे आम के वृक्ष को हरा-भरा बनाने, बकरे व भैसें की बलिक को चमत्कारिक रुप से बंद करवाने, कुंड में स्वतः गंगाजल प्रकट करने जैसे कई परचे दिए। यहां हर साल फाल्गुन बदी चौदस को मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें मेवाड़ व मारवाड़ क्षेत्र से 25 हजार से अधिक श्रद्धालु पहुंचते है।

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

एक्सप्रेस न्यूज़ डेस्क बुलंद आवाज के साथ निष्पक्ष व निर्भीक खबरे... आपको न्याय दिलाने के लिए आपकी आवाज बनेगी कलम की धार... आप भी अपने आस-पास घटित कोई भी सामाजिक घटना, राजनीतिक खबर हमे हमारी ई मेल आईडी GEXPRESSNEWS54@GMAIL.COM या वाट्सएप न 8094612000 पर भेज सकते है हम हर सम्भव प्रयास करेंगे आपकी खबर हमारे न्यूज पोर्टल पर साझा करें। हमारे चैनल GEXPRESSNEWS से जुड़े रहने के लिए धन्यवाद................