24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के 2624वें जन्मकल्याणक पर ‘इक जन्म्यो राजदुलारो, दुनिया नो तारणहारो’ गीत पर तपस्वी सभी झूम उठे

Mar 31, 2026 - 18:38
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24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के 2624वें जन्मकल्याणक पर ‘इक जन्म्यो राजदुलारो, दुनिया नो तारणहारो’ गीत पर तपस्वी सभी झूम उठे

सिरोही  (राजस्थान/ बरकत खान) श्री जीरावला जैन तीर्थ में 500 श्रमणीगणनायक आजीवन गुरु गुणचरणोपासक श्रीमद् विजय रश्मिरत्न सूरीश्वरजी महाराज, आचार्य श्री संयमरत्न सूरीजी आदि 100 साधु-साध्वी भगवंतों की निश्रा में बाली निवासी संघपति चंद्रावती बेन प्रकाशचंद (मुंबई) आयोजित शाश्वती चैत्री नवपद ओली के सातवें दिन 'सम्यक् ज्ञान' पद की आराधना के साथ 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का 2624वां जन्मकल्याणक खूब ठाठ से मनाया गया।आज मरुधररत्न आचार्य रत्नाकरसूरीजी श्री जीरावला पधारे व प्रवचन दिया।
41 ढाल के 1200 गाथा वाले 350 वर्ष पूर्व रचित श्रीपालरास के संगीतमय गान के बाद पूज्य जैनाचार्य श्री रश्मिरत्नसूरीजी ने जब घोषणा की कि 'क्षत्रियकुंड नगरी में महाराजा सिद्धार्थ की पटरानी त्रिशला देवी ने पुत्ररत्न को जन्म दिया', इतना सुनते ही सभी झूम उठे। भिवंडी के संगीत रत्न हर्षित शाह के कंठ से 'इक जन्म्यो राजदुलारो दुनिया को तारण हारो, वर्धमान नु नाम लईने प्रगट्यो तेज सितारो' तर्ज पर सभी तपस्वी झूमने लगे। चांदी के पालने में प्रभु को विराजमान कर लाभार्थी परिवार की महिलाओं ने पालना झुलाने का लाभ लिया। तत्पश्चात चांदी के रथ में प्रभु महावीर को विराजित कर एक किलोमीटर लंबी रथयात्रा निकाली गई। जिसमें बैंड बाजे, आदिवासी मंडली ,सौराष्ट्र मंडली, पंजाबी ढोल आदि अनेक झांकियों की शोभा देखते ही बनती थी। पारंपरिक धोती, कुर्ता, खेस व सफेद पगड़ी में सज्ज युवा भव्य रथ के पहियों की प्रदक्षिणा पर चलती ग्रीष्म ऋतु की तपती चिलचिलाती धूप में महावीर के रजत पालने के आगे नृत्य व चमर करते हुए परमात्मा के रथ को खींच रहे थे। रथ यात्रा पूर्णाहुति पर धवल तीर्थ मंडण प्राचीन श्री महावीर स्वामी के आगे चैत्यवंदन किया ।  दोपहर में भक्तों ने नवपद ध्यान शिविर भी गई व बहनों ने गीत सांझी का कार्यक्रम किया गया। रात्रि में धैर्य राठौड़ ने महाआरती करवाई गई।
 ता. 1 अप्रैल को आठवें दिन चारित्र पद की आराधना, 12 व्रत की पूजा शास्त्रीयरागों में श्री निकेश संघवी (सुरत) करेंगे। दोपहर में संयम संवेदना  का कार्यक्रम होगा।
आज के प्रवचन में -जैनाचार्य श्री रश्मिरत्न सूरीजी ने बताया कि आज तक अनंत तीर्थंकरों का इस धरती पर जन्म हो चुका है, परंतु हमारा कल्याण नहीं हुआ। कारण, हमारे भीतर परमात्मा का अवतरण नहीं हुआ। हमारे भीतर प्रभु महावीर का जन्म हो, उसके लिए हमें अहिंसा, सत्य, मैत्री करुणा को आत्मसात करना होगा तो ही क्रांति होगी।
कवि ने कहा है - "जलती आग को बुझा न सके, वो नीर ही क्या है? लक्ष्य को भेद न सके वो तीर ही क्या है? लाखों पद पर विजय पाने वाला यदि अपने पर विजय न पाए तो वो वीर ही क्या ?

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