कठूमर (दिनेश लेखी) उपखंड क्षेत्र में लगातार बढ़ते तापमान और भीषण गर्मी का असर अब केवल इंसानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पशुधन पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ने लगा है। पशुपालन विशेषज्ञों के अनुसार तेज गर्मी और लू के चलते दुधारू पशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है, जिससे दूध उत्पादन में 50 प्रतिशत तक कमी आने की आशंका जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भैंसों पर गर्मी का प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है। तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचने पर पशु हांफने लगते हैं, चारा कम खाते हैं और तनाव में आ जाते हैं। शाम के समय भी गर्मी अधिक रहने से पशु चरने से बचते हैं, जिसका सीधा असर उनकी सेहत और उत्पादन क्षमता पर दिखाई देता है।
कठूमर राजकीय पशु चिकित्सालय के कम्पाउंडर नीरज अवस्थी और सुधीर जैन ने बताया कि गर्मियों में पशुपालकों को पशुओं की देखभाल के तरीके में बदलाव करना चाहिए। दिन के बजाय रात के समय चारा डालना अधिक लाभकारी होता है, क्योंकि ठंडे वातावरण में पशु आराम से चारा ग्रहण करते हैं। यही कारण है कि जंगली जीव भी गर्मी में रात के समय चरने निकलते हैं।
उन्होंने पशुपालकों को सलाह दी कि पशुओं को छायादार स्थानों या हवादार कमरों में रखें। खिड़कियों व दरवाजों पर सूती कपड़ा या बोरी बांधकर समय-समय पर पानी डालते रहें, जिससे वातावरण ठंडा बना रहे। संभव हो तो पंखे या कूलर की व्यवस्था भी करें। सुबह-शाम पशुओं को नहलाना तथा जोहड़ या तालाब में छोड़ना भी उन्हें गर्मी से राहत देता है।
पशु चिकित्सकों के अनुसार गर्मी के कारण पशु कम चारा खाते हैं, जिससे शरीर कमजोर पड़ने लगता है। ऐसे में पशुओं को मीठा चारा और मिनरल मिक्स देना जरूरी है, ताकि उनकी ऊर्जा बनी रहे और दूध उत्पादन प्रभावित न हो। उन्होंने बताया कि जुलाई से दिसंबर के बीच अधिकतर पशु ब्याते हैं, जिससे दूध उत्पादन में फिर बढ़ोतरी होती है।
पशुपालक विष्णु जाट, राजेंद्र सिंह और नरेश कुमार ने बताया कि हर साल गर्मी और सर्दी के मौसम में उनके पशु कम दूध देने लगते हैं, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। उनका कहना है कि बरसात के बाद पशुओं की स्थिति सुधरती है, लेकिन तब तक परेशानी बनी रहती है।
पशुपालकों और विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे इंसान गर्मी से बचाव के उपाय करता है, उसी तरह पशुओं की देखभाल भी जरूरी है। उचित प्रबंधन और सावधानियों के जरिए न केवल पशुओं को लू से बचाया जा सकता है, बल्कि दूध उत्पादन को भी बनाए रखा जा सकता है।