किसान रासायनिक खाद छोड़ अपनाने लगे देसी तरीका, गेहूं और प्याज में मिल रहे बेहतर परिणाम
खैरथल (हीरालाल भूरानी) जिले के किसानों ने खेती का पुराना गणित पलटते हुए अब रासायनिक खादों से किनारा करना शुरू कर दिया है। महंगी खाद और कीटनाशकों के कारण खेती जब घाटे का सौदा बनने लगी, तो किसानों ने इसका समाधान पारंपरिक जैविक खाद में ढूंढ निकाला।
अब किसान गाय, भैंस के साथ-साथ भेड़ और बकरी के मल-मूत्र (मिगन) से तैयार खाद का उपयोग कर रहे हैं। चौंकाने वाले परिणाम यह हैं कि जैविक खाद वाले खेतों में रासायनिक खाद वाले खेतों की तुलना में प्रति बीघा 4 से 5 मन अधिक गेहूं की पैदावार हो रही है।
हांसपुर के किसान हुक्मसिंह और सौरवां के गांधी मेव ने बताया कि उन्होंने पिछले दो वर्षों से प्याज और गेहूं की फसल में रासायनिक खाद का उपयोग बंद कर दिया है। जिन खेतों में हजारों की रासायनिक खाद डाली, वहां गेहूं की पैदावार 25 से 28 मन प्रति बीघा रही, जबकि सिर्फ गोबर की खाद वाले खेतों में 32 मन उत्पादन मिला। वहीं झाड़का के किसान जलसिंह का कहना है कि दो साल पहले खाद न मिलने पर उन्होंने खेत में भेड़-बकरी बैठाई थी, जिससे पैदावार उम्मीद से बेहतर हुई। किसानों ने कहा कि अब वे पूरी तरह देसी खाद पर निर्भर हैं।
प्याज की फसल में ऑर्गेनिक खाद का जादू
हरसौली के किसान मातादीन सैनी और उद्यान विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, प्याज की फसल में पत्तियों का पीलापन दूर करने में ऑर्गेनिक खाद रासायनिक दवाओं से अधिक कारगर है। किसान अब बाजार से प्याज के कण (बीज) खरीदने के बजाय अपने ही खेतों में जैविक तरीके से इसे तैयार कर रहे हैं। इससे न केवल फसल की गुणवत्ता सुधरी है, बल्कि बाजार पर निर्भरता भी कम हुई है।
महेश खेरिया, कृषि अधिकारी, खैरथल का कहना है कि -- रासायनिक खादों की तुलना में पशुओं के मल-मूत्र में अधिक पोषक तत्व होते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और उत्पादन में वृद्धि होती है। रासायनिक खाद का खर्च बचने से किसानों की शुद्ध आय में बढ़ोत्तरी होगी। -
गोपाललाल मीणा, सहायक निदेशक, उद्यान विभाग, खैरथल का कहना है कि प्याज के कण तैयार करने में गाय-भैंस के गोबर की तुलना में भेड़-बकरी की सौरवां की खाद अधिक असरदार है। यदि फसल में पीलापन दिखे तो ऑर्गेनिक खाद सबसे बेहतर विकल्प है, जरूरत पड़ने पर ही सीमित कीटनाशक का उपयोग करें। -


