ईश्वर भोग प्रसादी के नही बल्कि भाव के है भूखे - कुंजकृष्ण महाराज; गिरिराज धरण के हलैना में गूंजे जयकारे
हलैना, (विष्णु मित्तल) कस्वा हलैना की इन्दिरा काॅलोनी में आयोजित हो रही श्रीमद् भागवत कथा श्रृवण करने भारी सख्यां में श्रद्वालुं उमड रहे है,जो कथा का रसपान करते हुए देश-समाज का उत्थान,सनातन धर्म की पालना,विश्वशान्ति,परिवार कल्याण आदि की कामनाए कर रहे है। भगवान श्रीराम और भगवान श्री कृष्ण जन्म प्रंसग के बाद इनकी बाल लीलाओं की कथाए सुनाई। जब श्री गिरिराज धरण लीला और पूजन उत्सव मनाया गया,तो पाण्डाल गिरिराज धरण और जय श्रीश्याम,जय श्री राधे,बनखण्डी बाबा सहित अन्य देवी-देवताओं के जयकारे से गूंज उठा। वृन्दावन धाम गोर्वधन से आए कथा वाचक कुंजकृष्ण जी महाराज ने कहा कि ईश्वर भोग प्रसादी के नही बल्कि भाव के है भूखे,हमे ईश्वर की प्राप्ति के लिए मानव,गौवंश,मूक बधिर प्राणियों की सेवा करनी चाहिए। भूखे को भोजन-जलपान,पक्षियों को चुग्गा-पानी,गौवंश व अन्य जीव-जन्तुओं को चारा,रोटी,फल आदि अवश्य खिलाए। ऐसी सेवा करने वाले से ईश्वर प्रसन्न रहते है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। उन्होने कहा कि ईश्वर हमेशा अहंकारी और घमंडी व्यक्ति से खफा रहते है,उसे सुधारने और सही मार्ग लाने के लिए सबक अवश्य सिखाते है। इन्द्र,हनुमान,गरूण,लक्ष्मण,अर्जुन, नारद आदि को ईश्वर की सेवा और भक्ति का घमण्ड था,इन सभी का घमण्ड दूर कर सही मार्ग पर लाए। इसी प्रकार कलियुग में मानव को पैसा,पद,बल,ज्ञान आदि का घमण्ड नही करना चाहिए साथ ही ईश्वर के नाम पर दिखावा भी नही करना चाहिए,ऐसा करने वाले से ईश्वर हमेशा खफा रहते है। उन्होने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज अंचल में जन्म और बाल लीलाएं की,जिन्हे सुनने और ब्रज अंचल की धरा सहित भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुडे धार्मिक स्थलों के दर्शन करने को देश-विदेश से आते है,अनेक ऐसे भी है ब्रज अंचल की रज प्राप्ति और दर्शन को तरसते है। कार्यक्रम के आयोजन रमललाल एडवोकेट ने बताया कि कथा का समापन एक नवम्बर को और दो को हवन व भण्डारा होगा। इस अवसर पर रामनिवास,हरिओम,सुनील,पूर्व सरपंच वासुदेव प्रसाद गोयल,सुरेशचन्द जिन्दल,योगेश कुमार,विनोद मित्तल,बलधारी मास्टर,पंचायत समिति सदस्य संजय गुप्ता,टिन्कू सिंघल,रामकिसन शर्मा,नरेन्द्र माफीदार,भगवान सिंह सोंलकी,रतन सिंह जाट,टिन्कू जिन्दल कपडा वाला,महेशचन्द गर्ग खाद वाला,गोपाल मित्तल दवा वाला,अशोक गोयल आदि ने कथा वाचक कुंजकृष्ण महाराज का साफा व माला पहनाकर सम्मान किया।