प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत और फिसला; 180 देशों में 157वें स्थान पर पहुँचा, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर उठ रहे सवाल

May 2, 2026 - 12:29
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प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत और फिसला; 180 देशों में 157वें स्थान पर पहुँचा, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर उठ रहे सवाल

दिल्ली (कमलेश जैन) एक रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) द्वारा जारी वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2026 ने भारत की लोकतांत्रिक छवि पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। 180 देशों में भारत का 157वां स्थान केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि यह संकेत है कि देश में पत्रकारिता की स्वतंत्रता लगातार दबाव में है। पिछले साल 151वीं रैंक से फिसलकर 157वें स्थान पर आना साफ दर्शाता है कि हालात सुधरने के बजाय और बिगड़े हैं।

यह गिरावट अचानक नहीं है, बल्कि इसके पीछे ठोस और चिंताजनक कारण हैं। सबसे बड़ा मुद्दा है पत्रकारों पर कानूनी शिकंजा। राष्ट्रीय सुरक्षा और मानहानि जैसे कानूनों का जिस तरह इस्तेमाल हो रहा है, वह सवाल खड़े करता है कि क्या ये कानून सुरक्षा के लिए हैं या आवाज़ दबाने के लिए? जब पत्रकार सच सामने लाने की कोशिश करता है और उसे ही अपराधी बना दिया जाता है, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर चोट है।

दूसरा बड़ा कारण है राजनीतिक दबाव और सत्तावादी प्रवृत्तियां। मीडिया, जो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, अगर सत्ता के दबाव में काम करने को मजबूर हो जाए तो फिर जनता तक सच्चाई कैसे पहुंचेगी? आज हालात ऐसे बनते जा रहे हैं जहां आलोचनात्मक पत्रकारिता को हतोत्साहित किया जा रहा है, और “अनुकूल” खबरों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

तीसरी और सबसे गंभीर चिंता है पत्रकारों की सुरक्षा। जब रिपोर्टिंग करना ही जोखिम भरा हो जाए, जब पत्रकारों पर हमले, धमकियां और मुकदमे आम हो जाएं, तो यह केवल मीडिया की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज की समस्या बन जाती है।
तुलना करें तो पड़ोसी देश पाकिस्तान 153वें स्थान पर है। यानी भारत उससे भी पीछे खड़ा दिखाई दे रहा है। वहीं नॉर्वे लगातार 10वें साल शीर्ष पर है, जो यह दिखाता है कि मजबूत लोकतंत्र में मीडिया की स्वतंत्रता को कैसे संरक्षित किया जाता है। सबसे निचले पायदान पर इरिट्रिया जैसे देश हैं, जहां मीडिया लगभग पूरी तरह नियंत्रित है। और भारत का उस दिशा में खिसकना चिंता बढ़ाने वाला संकेत है।
स्पष्ट है कि प्रेस फ्रीडम इंडेक्स केवल रैंकिंग नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सेहत का आईना है। अगर मीडिया स्वतंत्र नहीं रहेगा, तो जनता की आवाज़ भी कमजोर पड़ जाएगी। सवाल यह नहीं है कि रैंकिंग क्या आई, सवाल यह है कि क्या हम एक ऐसे लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं जहां सच बोलना जोखिम बनता जा रहा है?
अब जरूरत केवल चिंता जताने की नहीं, बल्कि ठोस सुधारों की है। ताकि पत्रकारिता फिर से निर्भीक होकर जनता के हक में खड़ी हो सके।

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