कबाड़ से बना 'कमाल' अलवर में लोहे के कचरे से बनीं शानदार मूर्तियां
अलवर (कमलेश जैन) अलवर नगर निगम ने 58 लाख के बजट से 'वेस्ट टू आर्ट' प्रोजेक्ट के तहत लोहे के स्क्रैप से शानदार मूर्तियां तैयार करवाई हैं।दिल्ली के कलाकारों द्वारा बनाए गए ऊंट, मोर और खिलाड़ियों के पुतले अब शहर के प्रमुख पार्कों और चौराहों की शोभा बढ़ा रहे हैं।
अलवर शहर में इन दिनों नगर निगम और यूआईटी की एक अनोखी पहल चर्चा का विषय बनी हुई है. “वेस्ट टू आर्ट” (Waste to Art) प्रोजेक्ट के तहत शहर के कबाड़ और पुराने लोहे के स्क्रैप को कलात्मक मूर्तियों में बदला जा रहा है. नगर निगम ने करीब 58 लाख रुपए का टेंडर दिल्ली की एक विशेषज्ञ कंपनी को दिया है, जिसका उद्देश्य बेकार पड़े कचरे का रचनात्मक उपयोग कर शहर का सौंदर्यीकरण करना है. इस परियोजना के जरिए न केवल पार्कों की रौनक बढ़ी है, बल्कि आमजन को पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता का एक सशक्त संदेश भी मिल रहा है।
दिल्ली के प्रसिद्ध कलाकार नितिन मेहता और उनकी अनुभवी टीम ने इन कलाकृतियों को बड़ी मेहनत से तैयार किया है। टीम ने टूटे हुए डस्टबिन, पुरानी बाइक की चेन, जालियों वाले तार, लोहे की छड़ें और ऑटोमोबाइल के बेकार पुर्जों का इस्तेमाल कर सजीव दिखने वाली मूर्तियां बनाई हैं. इन कलाकारों का मानना है कि कचरा तब तक कचरा है जब तक उसमें कला का समावेश न हो. उनकी इस रचनात्मक सोच ने अलवर के सार्वजनिक स्थलों को एक नई पहचान दी है, जहाँ अब लोहे का कबाड़ कबाड़खाना न रहकर कला का प्रदर्शन केंद्र बन गया है।
प्रमुख स्थलों पर स्थापित कलाकृतियां
शहर के अलग-अलग कोनों में अब तक छह प्रमुख कलाकृतियां स्थापित की जा चुकी हैं। कंपनी बाग में ऊंट और योग करती महिला की आकृति लोगों को लुभा रही है, वहीं नेहरू गार्डन में लोहे के स्क्रैप से बना विशाल मोर (मयूर) आकर्षण का केंद्र है। जिला सचिवालय परिसर में भारत का नक्शा लगाया गया है, जिसे पूरी तरह पुराने लोहे के सामान से बनाया गया है। इसके अलावा, प्रताप ऑडिटोरियम में भगवान नटराज की भव्य प्रतिमा और इंदिरा गांधी स्टेडियम में क्रिकेट, टेनिस, हॉकी और जैवलिन थ्रो करते खिलाड़ियों के पुतले लगाए गए हैं। ये मूर्तियां न केवल सुंदर हैं, बल्कि युवाओं को खेलों के प्रति प्रेरित भी कर रही हैं।
स्वच्छ भारत मिशन और सेल्फी पॉइंट नगर निगम अधिकारियों के अनुसार, यह पहल स्वच्छ भारत मिशन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके तहत कबाड़ के पुनर्चक्रण को बढ़ावा दिया जा रहा है। बड़ी कलाकृतियों को क्रेन की मदद से निश्चित स्थानों पर स्थापित किया गया है। शहरवासियों और बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए ये स्थान अब प्रमुख सेल्फी पॉइंट बन चुके हैं।कचरे के दोबारा उपयोग की यह रचनात्मक सोच न सिर्फ अलवर की सुंदरता बढ़ा रही है, बल्कि भविष्य के लिए एक स्थायी विकास का मॉडल भी पेश कर रही है।