राजकीय विद्यालयों में 7 मई से शुरू हो ग्रीष्मावकाश, शिक्षकों के हितों का रखा जाए ध्यान: देवेंद्र सिंह सिद्धू
एनपीएसईएफआर ने सरकार को भेजा पत्र, अवकाश में कटौती पर जताई आपत्ति — जून की गर्मी में बच्चों के स्वास्थ्य पर भी जताई चिंता
कठूमर (दिनेश लेखी) राजस्थान में ग्रीष्मावकाश को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। न्यू पेंशन स्कीम एम्पलाइज फेडरेशन ऑफ़ ने राजस्थान के मुख्यमंत्री एवं शिक्षा मंत्री को पत्र लिखकर विद्यालयों में ग्रीष्मावकाश 7 मई से प्रारंभ करने की मांग की है।
प्रदेश संयुक्त सचिव देवेंद्र सिंह सिद्धू ने बताया कि शिक्षा विभाग द्वारा जारी शिविरा पंचांग के अनुसार इस वर्ष ग्रीष्मावकाश के बाद विद्यालय 21 जून से खोले जाने प्रस्तावित हैं, जबकि पिछले वर्षों में विद्यालय 1 जुलाई से खुलते रहे हैं। उन्होंने कहा कि पिछले दो वर्षों के शिविरा पंचांग का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि सत्र 2026-27 में शिक्षकों के लगभग 10 दिनों के ग्रीष्मावकाश में कटौती हो रही है, जो उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि शिक्षक कर्मचारी ही सरकार की योजनाओं को धरातल तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कई ऐसे कार्य जिन्हें अन्य कर्मचारी करने से कतराते हैं, उन्हें शिक्षक ही जिम्मेदारी के साथ पूरा करते हैं। ऐसे में सरकार को शिक्षकों के हितों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
एनपीएसईएफआर संगठन ने सुझाव दिया है कि यदि सरकार 21 जून को विश्व योग दिवस विद्यालयों में धूमधाम से मनाना चाहती है, तो इसके लिए ग्रीष्मावकाश 7 मई से प्रारंभ किया जाए, ताकि शिक्षकों के अवकाश में कटौती न हो और विभागीय कार्य भी प्रभावित न हों।
सिद्धू ने राजस्थान की भौगोलिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए कहा कि जून माह में अत्यधिक गर्मी पड़ती है, जिसका छोटे बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में विद्यार्थियों के लिए ग्रीष्मावकाश 30 जून तक बनाए रखना आवश्यक है।
उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि यदि शिक्षा विभाग 21 जून को विद्यालय खोलने पर अडिग रहता है, तो शिक्षकों के लिए ग्रीष्मावकाश 7 मई से 20 जून तक निर्धारित किया जाए। अन्यथा पूर्व व्यवस्था के अनुसार शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के लिए 16 मई से 30 जून तक ग्रीष्मावकाश यथावत रखा जाए।
अंत में देवेंद्र सिंह सिद्धू ने शिक्षकों से एकजुटता बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि यह समय है जब शिक्षक समुदाय को अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर आवाज उठानी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक शिक्षक का कर्तव्य है कि वह कर्मचारी विरोधी नीतियों के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराए और संगठनों के साथ मजबूती से खड़ा रहे।


