श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस उमड़ा श्रद्धा का सागर, शिव-पार्वती विवाह प्रसंग ने भक्तों को किया भाव-विभोर
कठूमर/ दिनेश लेखी। ग्राम सलेमपुर में श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञानयज्ञ के द्वितीय दिवस पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। कथा पंडाल में दिनभर भक्ति और श्रद्धा का वातावरण बना रहा। कथा व्यास आचार्य यशेश जी महाराज ने अपने ओजस्वी प्रवचनों के माध्यम से मानव जीवन में अहिंसा, आत्मसंयम एवं इंद्रिय-निग्रह के महत्व पर प्रकाश डाला।
आचार्य यशेश जी ने भगवान कपिल एवं माता देवहूति के दिव्य संवाद का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि मनुष्य जब अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है, तभी उसका जीवन सफल होता है और वह परमात्मा की ओर अग्रसर होता है। उन्होंने क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार एवं विषय- वासनाओं पर विजय प्राप्त करने को आत्मज्ञान की प्राप्ति का मार्ग बताया।
कथा के दौरान माता सती एवं भगवान शिव की पावन कथा का भी भावपूर्ण वर्णन किया गया। प्रजापति दक्ष के अहंकार, दक्ष यज्ञ के विनाश, माता सती के आत्मोत्सर्ग तथा माता पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लेकर भगवान शिव से हुए दिव्य विवाह प्रसंग का मनोहारी वर्णन सुन श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। कथा के साथ प्रस्तुत आकर्षक ब्रजमंडल झांकियों ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। पूरा पंडाल "हर-हर महादेव" एवं "भोलेनाथ की जय" के जयघोषों से गूंज उठा।
आचार्य जी ने भगवान श्रीहरि के वराह अवतार एवं हिरण्याक्ष वध की कथा का भी विस्तार से वर्णन करते हुए बताया कि जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब भगवान अधर्म के विनाश और भक्तों की रक्षा के लिए अवतार धारण करते हैं।
अपने प्रेरक संदेश में उन्होंने कहा कि भगवान जाति, पद, धन या वैभव नहीं देखते, बल्कि निष्कपट प्रेम और सच्ची भक्ति को स्वीकार करते हैं। महाभारत का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के छप्पन भोगों की अपेक्षा भक्त विदुर के प्रेमपूर्वक अर्पित साधारण भोजन को अधिक महत्व दिया, क्योंकि भगवान के लिए भक्त का निर्मल हृदय ही सर्वोपरि है। कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भक्ति रस में सराबोर होकर भगवान के जयघोष किए। संपूर्ण वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा, श्रद्धा एवं भक्ति से ओत-प्रोत रहा। आयोजन समिति ने श्रद्धालुओं से आगामी कथा प्रसंगों में अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त करने की अपील की।
इस मौके पर सरपंच नवाब सिंह, विजेंद्र सिंह, रामचन्द्र सिंह, मोती सिंह, कारण सिंह हरिओम मीणा, गोपाल मीणा, बबलू मीणा , रतिराम मीणा, ओमप्रकाश शर्मा, राजेश शर्मा, शिवराम सैनी, बिरजू सैनी, मूलचंद सैनी , महंत रामकेश पुजारी आदि मौजूद थे।


