जयपुर यूनेस्को हेरिटेज खतरे में: अवैध निर्माण पर हाईकोर्ट सख्त, नगर निगम को मुख्य बाजारों से तुरंत अतिक्रमण हटाने के निर्देश
जयपुर /राजस्थान
गुलाबी नगरी के ऐतिहासिक वजूद और यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में उसके स्थान को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने अत्यंत कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने जयपुर नगर निगम (हेरिटेज) को चारदीवारी (वॉल सिटी) क्षेत्र में बेधड़क हो रहे अवैध निर्माणों और अतिक्रमणों को तुरंत रोकने और उन्हें ध्वस्त करने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने मौखिक रूप से गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा, "नवंबर 2027 में जयपुर की स्थापना के 300 साल पूरे होने जा रहे हैं। यह शहर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है। यदि अवैध निर्माणों के कारण इसका मूल हेरिटेज लुक प्रभावित हुआ, तो यूनेस्को का यह विश्व धरोहर का प्रतिष्ठित खिताब जयपुर से छिन भी सकता है।"
पहले फेज में इन मुख्य रास्तों पर चलेगा पीला पंजा
जितेंद्र शर्मा द्वारा दायर जनहित याचिका पर शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने नगर निगम कमिश्नर को दो-टूक निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि प्रथम चरण में मुख्य सड़कों और प्रमुख बाजारों को अतिक्रमण मुक्त कराया जाए। इनमें शामिल हैं:
- किशनपोल बाजार रोड
- चौड़ा रास्ता
- जौहरी बाजार रोड
- चांदपोल से बड़ी चौपड़ व मार्ग
अदालत ने इन क्षेत्रों में जारी अवैध निर्माणों को तत्काल रोकते हुए अतिक्रमण हटाने और चारदीवारी के मूल हेरिटेज स्वरूप को फिर से बहाल करने के आदेश दिए हैं।
आवासीय संपत्तियों का व्यावसायिक इस्तेमाल और नियमों की धज्जियां
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता उमेश शर्मा ने कोर्ट को अवगत कराया कि चौकड़ी विश्वेश्वर जी, चौड़ा रास्ता स्थित ऐतिहासिक 'पगड़ी बंध हाउस' सहित कई भवनों में अवैध रूप से व्यावसायिक परिसरों का निर्माण किया जा रहा है। यह निर्माण कार्य न केवल नगर निगम द्वारा दी गई स्वीकृतियों के विपरीत है, बल्कि 'जयपुर नगर निगम हेरिटेज (चारदीवारी) विरासत संरक्षण एवं सुरक्षा उप-नियम, 2020' का खुला उल्लंघन भी है।
याचिका में बताया गया कि पुरानी दुकानों के ऊपर बिना किसी वैध अनुमति के धड़ल्ले से कंक्रीट, आरसीसी (RCC) पिलर और ईंटों की दीवारें खड़ी की जा रही हैं। इस प्रकार का मनमाना निर्माण विश्व धरोहर क्षेत्र की पहचान यानी इसके 'यूनिफॉर्म लुक' (एकसमान दृश्य) और मूल स्थापत्य कला को अपूरणीय क्षति पहुंचा रहा है।

