बीज सोलिंग से जंगल तैयार करना अधिक सम्भव - राम भरोस मीणा

Jul 8, 2026 - 19:11
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बीज सोलिंग से  जंगल तैयार करना अधिक सम्भव -  राम भरोस मीणा

 पिछले वर्ष करोड़ों पौधों की मौत हुयी, फिर भी बांट रहे हैं पेड़, पर्यावरण संरक्षण के नाम पर यह धोखा है।

पौधे बांटने के बजाय यदि इसका आधा पैसा भी सेना व स्वैच्छिक संस्थाओं को दे दिया जाए तो हो सकता है 100 प्रतिशत वृक्षारोपण।

अलवर (राजस्थान) उजड़े जंगलों को आबाद करने, वन भूमि पर पुनः पेड़ लगाने, बढ़ते पर्यावरणीय तापघात को रोकने, वातावरण में बढ़ती ज़हरीली गैसों से निजात पाने के नाम पर सम्बन्धित विभागों, स्वैच्छिक संगठनों, ग्राम समुदायों द्वारा जुलाई - अगस्त के महीने में सघन वृक्षारोपण किया जाता है, और यह कार्य सम्पूर्ण देश में होता है। वृक्षारोपण के नाम पर गड्डे खुदाई, फेंसिंग, पेड़ लगाने, पानी देने के नाम पर काफी खर्च भी किया जाता है, यह सत्य है। ख़ैर पेड़ लगाने है तब खर्चा भी होगा, यह भी सही है। एक पेड़ मां के नाम, पर्यावरण सुरक्षा सप्ताह, पर्यावरण दिवस, वन उत्सव, नया प्लान्टेशन जैसे कार्यक्रमों में लाखों - करोड़ों पौधें प्रत्येक वर्ष लगाए जाते हैं। लेकिन यह किसी ने नहीं सोचा और न ही कोई यह देखता है कि आखिर  लगाए गए पौधे जिंदा भी हैं या नहीं। कहीं उनकी हत्या तो नहीं हुई, या फिर वो सभी पेड़ बन गए। दूसरा सवाल यह उठता है कि जब करोड़ों पौधे पेड़ बन गए, तब प्रत्येक वर्ष इतने पेड़ लगाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है ? यदि वे पेड़ नहीं बने, तो उसका कारण क्या रहा ।  खैर जो भी है, हकीकत यह है कि लगाए गए पौधों के औसतन 30 से 40 प्रतिशत पौधे ही जीवित बच पाते हैं,  वे पेड़ बनते हैं। यह कटु सत्य है। फिर यदि प्लान्टेशन पत्थरीली कंक्रीट या बड़ी चट्टानों वाले पहाड़ी क्षेत्रों में हुआ,  तो वहां उनके जीवित रहते पेड़ बनने का औसत 20 से 25 प्रतिशत, मैदानी इलाकों में 40 से 45 प्रतिशत, नहरी क्षेत्रों तथा नदी नालों के बहाव क्षेत्रो में 50 से 60 प्रतिशत ही पौधे जीवित रह पाते हैं। पौधों के खत्म होने की स्थिति में सम्बन्धित कार्यकारी एजेंसियां पुनः रिप्लेसमेंट करते हैं। बावजूद इसके 60 से 65 प्रतिशत ही इस कार्य में सफलता प्राप्त होती है। गौरतलब है कि इन परिस्थितियों में असफलताओं से बचने, प्लांटेशन कों सफल बनाएं रखने के लिए पहले वर्ष से ही बीजों का छिड़काव कर दिया जाता है। बीज से बने पेड़ों को भी लगाएं गए पौधों के साथ काउंटिग कर टारगेट पूरा हुआ दिखाया जाता है। फिर प्लान्टेशन की समय सीमा भी बढ़ा दी जाती है।

 यदि पिछले दस सालों में लगाएं गए पौधों पर एक नजर डालें, तब पता चलता है कि पंचायतीराज विभाग द्वारा लगाएं गए पौधों में 90 प्रतिशत नष्ट हुए हैं। विद्यालयों के 82  प्रतिशत, पीडब्ल्यूडी विभाग के 87  प्रतिशत, वन विभाग के 76  प्रतिशत, समुदायों - स्वैच्छिक संस्थाओं के 10 प्रतिशत, सेना और अर्धसैनिक बलों के 05 प्रतिशत ही पौधे नष्ट हुए हैं, जबकि इस समय वृक्षारोपण के नाम पर सर्वाधिक पौधे वन विभाग, पीडब्ल्यूडी, पंचायतीराज विभाग, शिक्षा विभाग द्वारा लगाए जा रहे हैं और इस कार्य पर करोड़ों-करोड की राशि खर्च की जाती है,जैसाकि मेरा अनुभव है।

आखिर उजड़े जंगलों को आबाद करने, वीरान भूमि को हरी-भरी बनाने के लिए जो काम करोड़ों-करोड  खर्च करने से नहीं हो पा रहा,  वहीं कार्य हजारों खर्च करने से अच्छे से किया जा सकता है। आवश्यकता है हमें अनुभवों की और धरती की प्रकृति को समझनें की, जहां पर हमें वृक्षारोपण करना है। दरअसल वृक्षारोपण से पहले हमें वहां की वनस्पतियों का अध्ययन भी करने की आवश्यकता है। मिट्टी, वनस्पति के साथ प्राकृतिक वातावरण, मौसम को समझते हुए कम से कम पौधे लगाने के साथ अधिक से अधिक बीजों को मिट्टी में दबाना भी आवश्यक है।

स्थानीय प्रजातियों के पेड़ - पौधों, वनस्पतियों, झाड़ियों के बीजों का छिड़काव के साथ मिटटी में हल्की खुदाइ कर बीज दबा दें, उस दशा में जल्दी से पौधे अपना विकास कर पाते है। लगाए गए पौधों में ग्रोथ कम होने के साथ 30 से 40 प्रतिशत मरने की आशंका ज्यादा रहती है। यह पिछले बीस साल से वृक्षारोपण के कार्यों तथा बीज सोलिंग में जुटे रहने का मेरा निजी  अनुभव है। यह कार्य तो मैंने स्वयं अपने हाथों किया है। वहीं आज अध्ययन का विषय बनता जा रहा है। इसी को लेकर हम लोगों को जागरूक कर रहे हैं। अपना अनुभव लोगों के साथ साझा कर रहे हैं। वृक्षों में वृद्धि के लिए जन सामान्य को प्रेरित कर रहे हैं। यही नहीं बीजों के छिड़काव से प्रत्येक वर्ष हजारों पेड़ भी तैयार करते हैं और लागत महज़ पांच से दस हजार रुपए के बीच आतीं है, जो ना के बराबर है। जहां प्लांटेशन करना होता है, उस क्षेत्र का भौगौलिक अध्ययन, वनस्पतियों का अध्ययन करना बहुत जरूरी होता है। इसके साथ क्षेत्र विशेष में मानव दखलंदाजी रोकने की भी बहुत आवश्यकता होती है। इस तरह महज़ तीन से पांच वर्ष में जंगल स्वयं तैयार हो जाता है। इसमें दो राय नहीं है।

  • लेखन -प्रकृति प्रेमी एवं पर्यावरणविद् राम भरोस मीणा 

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