प्राकृतिक असंतुलन, बाढ़ और जलवायु परिवर्तन

Sep 7, 2025 - 12:55
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प्राकृतिक असंतुलन, बाढ़ और जलवायु परिवर्तन

थानागाजी (रामभरोस मीणा) मौसम परिवर्तन के साथ हालही नदियों में आयें एकाएक उफ़ान ने देश के हालात नाजुक करने के साथ एक तरफ़ लाखों लोगों की आजिविका  नष्ट हो गई, सैकड़ों की मौत हो गई, हजारों के आवास नष्ट हो गये और यह हालात पंजाब, हिमालय राज्यों के साथ राजस्थान, असम, ओड़िशा, बिहार, तमिलनाडु , उत्तर प्रदेश में भी पैदा हुए हैं, चारों ओर पानी ही पानी दिखाई दे रहा है, फ़सल नष्ट होते,पशुओं को मरते देख आम आदमी सदमे में हैं, आजिविका के संसाधन नष्ट हुए हैं। 
अब बात  आती है कि वर्षा के पानी को हम सही से संजोए नहीं रख सकते, पंजाब में रावी व्यास सतलुज नदी में आएं उफ़ान ने पंजाब के किसानों की रीढ़ तोड़ डालीं, समय से नहरों की मरम्मत नहीं होती, पुराने बांधों की सार-संभाल नहीं होती और हम राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना -NPP के तहत् राष्ट्रीय नदी जोड़ो योजना - NRLP की बात करें वो मिथ्या साबित होती है, और सत्य भी है, राजस्थान के सवाईमाधोपुर में बांध टूटने से आपदा पैदा हो गई, वैसे हम बात पार्वती कालीसिंध चंबल लिंक परियोजना( राम सेतु लिंक परियोजना)  चम्बल से ERCP परियोजना के साथ बांधों में पानी पहुंचाने की कर रहे हैं। हरियाणा में गुरु ग्राम के कादरपुर का बांध, बहादुरगढ़ के मंगेशपुर नाले का बांध टूटने से हरियाणा में बाढ़ के हालात पैदा हो सके।
ख़ैर समय और परिस्थितियों के साथ योजना परियोजनाओं का बनना आवश्यक है, पिछले तीन चार दशकों में विकास के नाम प्राकृतिक संसाधनों का आवश्यकता से अधिक दोहन हुआ,  चाहें नदियों पर बांध बनाने,  जंगलों को नष्ट कर औधोगिक ईकाईयों की स्थापना, खनिज पदार्थों के खनन, शहरीकरण, सड़क निर्माण या चौड़ाई करण, सौन्दर्य करण, ट्यूरिज्म को बढ़ावा देने अथवा अणु परमाणु परिक्षण,  जों भी हो प्रकृति पर विजय प्राप्त करने या प्रकृति से मानव श्रेष्ठ होने का जनून पैदा हुआ और व्यक्ति ने अपने निजी स्वार्थ के चलते छेड़छाड़ करना प्रारंभ किया, पिछले तीन चार दशकों से हुई छेड़छाड़ ने हिमालय में हिमपात पर प्रभाव डाला, बर्फ का स्तर गिरता चला गया, नदियों के तट सिकुड़ते चलें गए, व्यक्ति नदियों के बहाव क्षेत्रों के उस उबड़-खाबड़ भू-भागों कों समतलीकरण कर विकास के नाम औधोगिकीकरण शहरीकरण, ट्यूरिज्म को बढ़ावा देने लगी, और होना भी यही था, इतने लम्बे समय के अंतराल में भला कौन नदियों के तांडव नृत्य को देखा होगा, फिर सरकारी स्तर पर भी नदियों को रोकने टोकने मारने की साजिशें लम्बे समय से चल रही है, चाहें बांध बना कर, नहरें बना कर अथवा अपने हक का पानी रोकने के नाम नदी को कहीं ना कहीं टोका गया। पर्वतीय तथा मैदानी क्षेत्रों में प्रकृतिप्रदत्त सभी संसाधनों के साथ बड़े स्तर पर उन्हें उपभोग के योग्य मानकर खोंसा गया, संरक्षण नहीं दिया, परिणामस्वरूप एका एक प्रकृति ने अपने संतुलन बनाने के लिए, व्यक्ति की श्रेष्ठता पर प्रश्न लगा कर उसे समझाने की कौशिश रहीं हैं, सत्य भी है, जब जब विकास चरम पर पहुंचा तब तब विनाश प्रारम्भ हुआ, प्रकृति के सामने सभी हारे हैं, चाहें जब की बात करें इसके सामने इंसान हमेशा बौना रहा है।
नदियों में उफान, बाढ़ के हालात, घरों का उजड़ना, सितम्बर महीने की तेज़ तर्रार वर्षा से उभर नहीं पाएगा उसके साथ शरद हवाओं का जल्दी प्रारम्भ होना,  दिसम्बर में हाड़ कंपाती ठंड, तेज़ बर्फबारी और साथ में बच्चों  जानवरों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने उन्हें जीवित रखने की फ़िक्र, एक चुनौती भरा कार्य है, निभाना भी है और वह भी स्वमं कों।
ख़ैर अब हमें प्रकृति से कुछ सिखाना चाहिए, हमें अपनी नितियों नियमों में संशोधन करना चाहिए, विकास  प्रकृति को ध्यान में रखते करना चाहिए, प्राकृतिक संसाधनों, नदियों नालों को संरक्षण प्रदान करना चाहिए, शहरी करण को बढ़ावा देने से पहले भौगोलिक स्थिति का अध्ययन करना चाहिए, पहाड़ी तथा हिमालयी क्षेत्रों के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए अन्यथा हमें पुनः किसी और बड़ी त्रासदी का सामना करना पड़ सकता है, जो देश के विकास को अवरूद्ध करने के साथ सब कुछ तबाह कर सकता है। लेखक के अपने निजी विचार है।

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