धौलागढ़ में 'ब्रह्मचारिणी' रूप में विराजमान हैं माता; रामायण काल से जुड़ा है मंदिर का वैभवशाली इतिहास
लक्ष्मणगढ़ (कमलेश जैन)। अलवर जिले के कठूमर-लक्ष्मणगढ़ क्षेत्र स्थित प्रसिद्ध धौलागढ़ देवी मंदिर इन दिनों श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहाँ माता रानी अपने अनूठे 'ब्रह्मचारिणी' रूप में विराजमान हैं। मंदिर का इतिहास रामायण काल का बताया जाता है और वर्तमान में चल रहे वार्षिक मेले में देश के कोने-कोने से भक्त माता के दरबार में मत्था टेकने पहुँच रहे हैं।
- पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व:
मंदिर के पुजारी दिनेश शर्मा ने बताया कि उनका परिवार 15 पीढ़ियों से माता की सेवा कर रहा है। मान्यताओं के अनुसार, राम-रावण युद्ध के दौरान सुग्रीव के पुत्र दधिवल ने इसी स्थान पर माता की तपस्या कर शक्ति अर्जित की थी। साथ ही, प्रसिद्ध ऐतिहासिक पात्र आला-उदल में से उदल की इष्टदेवी भी धौलागढ़ माता ही हैं।
- अद्वितीय स्वरूप: शांति और प्रेम का प्रतीक:
धौलागढ़ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जहाँ अन्य मंदिरों में माता सिंह पर सवार होती हैं, वहीं यहाँ माता के समीप सिंह खड़ा हुआ है। इस सिंह का मुख उत्तर दिशा की ओर है, जिसे शांति और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। मंदिर में माता की भव्य संगमरमर की प्रतिमा के साथ चौसठ योगिनियों में से जया और विजया भी विराजमान हैं।
- बंजारा व्यापारी और 'कौड़ी' की अनूठी परंपरा:
इतिहास के अनुसार, अलीगढ़ के एक बंजारा व्यापारी को माता ने दर्शन दिए थे, जिसके बाद उन्होंने इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया। आज भी उस बंजारा परिवार के वंशज जब यहाँ दर्शन के लिए आते हैं, तो माता को दक्षिणा के रूप में 'कौड़ी' ही चढ़ाते हैं।
- वैशाख मेले का आयोजन:
माता का विशाल मेला प्रतिवर्ष वैशाख मास की पंचमी से एकादशी तक आयोजित होता है। सप्तमी की मध्यरात्रि को माता का प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है, जिस अवसर पर विशेष श्रृंगार और महाआरती होती है। मंदिर पहाड़ी पर स्थित है जहाँ पहुँचने के लिए 163 सीढ़ियां हैं, हालांकि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए अब वाहन मार्ग भी बना हुआ है।
वर्तमान मेले में अलवर के अतिरिक्त जयपुर, भरतपुर, मथुरा (यूपी), नासिक और पुणे (महाराष्ट्र) जैसे दूर-दराज के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में भक्त अपनी मन्नतें लेकर पहुँच रहे हैं।

