शाहबाद जंगल में पेड़ों की कटाई, जीने के अधिकार का हनन : अन्सार इन्दौरी

Mar 25, 2026 - 19:44
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शाहबाद जंगल में पेड़ों की  कटाई, जीने के अधिकार का हनन : अन्सार इन्दौरी

अंता (शफीक मंसूरी ) मांगरोल, 25 मार्च । शाहबाद घाटी के 100-200 वर्षों से विकसित सघन वन क्षेत्र में ग्रीनको एनर्जी के निजी पावर प्लांट के लिए केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई 1,19,759 पेड़ों की कटाई की अनुमति जीने के अधिकार का हनन  है। साथ ही यह पूर्णतः अगौरवणिक, गैर-कानूनी और मानवाधिकारों का उल्लंघन है । यह बात  मानवाधिकार कार्यकर्ता और ऑल इंडिया लॉयर्स एसोसियेशन फॉर जस्टिस के प्रदेश कन्वीनर एडवोकेट अन्सार इन्दौरी ने कहीं। वह एक दिवसीय निजी प्रवास पर कस्बा मांगरोल आए हुए थे। प्रेस को जारी एक बयान में उन्होंने कहा कि वह पेड़ काटने की इस कार्रवाई का तीव्रता से विरोध करते है, क्योंकि
यह केवल पर्यावरण को नहीं, बल्कि लाखों लोगों के जीवित रहने के अधिकार को फिर से खतरे में डाल रही है। उन्होंने कहा कि पेड़ों और जंगलों का मानव जीवन के लिए अभिन्न महत्व है। जंगल केवल लकड़ी का भंडार नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की नींव हैं। मानव को जीवित रहने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन गैस केवल वनों से ही प्राप्त होती है; पेड़ों की कटाई से श्वसन रोगों में भारी वृद्धि निश्चित है। शाहबाद के जंगल भूजल को रिचार्ज करते हैं और बारिश को आकर्षित करते हैं। इनके नष्ट होने से क्षेत्र में जल संकट और सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। स्थानीय जनजातीय और खेतीबाड़ी करने वाले समुदाय जंगल से खाद्य पदार्थ, औषधियाँ और आजीविका प्राप्त करते हैं,जंगल काटने का सीधा असर स्थानीय जनजाति की भूखमरी पर पड़ेगा । जंगल मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, इन्हें काटने से जमीन बंजर होगी और कृषि योग्य भूमि समाप्त होगी।
शासक वर्ग द्वारा निजी पावर प्लांट के नाम पर "विकास" का ढोंग नहीं, बल्कि स्थायी "विनाश" थोपा जा रहा है।
 100-200 वर्ष पुराने पेड़ों को काटने से जमीन में जमा कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल में मिश्रित होगी, जिससे हरितगृह प्रभाव और तापमान में वृद्धि निश्चित है।
उन्होंने कहा इस क्षेत्र में रहने वाले लाखों प्रजातियों के वन्यजीव और पक्षी अपना घर खो देंगे, जिससे जैव-विविधता स्थायी रूप से नष्ट होगी । ऐसी ऊर्जा परियोजनाएं अक्सर मीथेन गैस के उत्सर्जन का कारण बनती हैं, जो कार्बन डाइऑक्साइड से भी अधिक खतरनाक होती है और भविष्य के तापमान वृद्धि को तेज करती है। धूल, धुएं और भारी वाहन आवागमन से स्थानीय निवासियों में श्वसन रोग, कैंसर और हृदय रोगों की दर में तेजी से वृद्धि होगी, जो एक मानवाधिकार अपराध है।
उन्होंने सरकार से अनुरोध किया है कि शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति और स्थानीय लोगों के विरोध को अनदेखा करना लोकतंत्र के सिद्धांतों के विरुद्ध है। उन्होंने सरकार और संबंधित अधिकारियों से मांग  कि है कि शाहबाद संरक्षित वन अभ्यारण्य में पेड़ों की कटाई का तत्काल काम बंद किया जाए।
नीति निर्माण में स्थानीय  निवासियों की सहमति अनिवार्य की जाए। यदि ऊर्जा की आवश्यकता है, तो सौर और पवन ऊर्जा जैसे गैर-पर्यावरण विनाशकारी विकल्पों को प्राथमिकता दी जाए, न कि जंगल नष्ट करके ।
अगर शासन ने इस अन्याय पर रोक नहीं लगाई, तो स्थानीय निवासियों द्वारा "चिपको आंदोलन" और "खेजड़ी आंदोलन" जैसा स्वरूप ले सकते हैं, जैसा कि पहले भी चेतावनी दी जा चुकी है। प्रकृति का विनाश मानव जीवन का विनाश है। उन्होंने नागरिकों से   राज्य के  इस अपराध के विरोध में एकजुट होने की अपील की  है।

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