खैरथल में कृषि क्षेत्र का ऐतिहासिक बदलाव: किसानों के लिए 'वरदान' बनी सरसों की पराली; लागत हुई शून्य, ट्रैक्टर चालकों की कमाई में भारी उछाल
खैरथल (हीरालाल भूरानी) कभी क्षेत्र के किसानों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द और पर्यावरण के लिए चुनौती मानी जाने वाली सरसों की पराली (पदाड़ी) अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था में समृद्धि का नया जरिया बन चुकी है। आधुनिक कृषि पद्धतियों और औद्योगिक मांग के चलते जिस पराली को पूर्व में किसान खेतों में ही जलाने के लिए विवश थे, वही पराली अब स्थानीय ईंट भट्टों के लिए सबसे सस्ता, सुलभ और असरदार ईंधन साबित हो रही है। इस युगांतरकारी बदलाव से जहां किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के भारी खर्च से पूर्ण राहत मिली है, वहीं ग्रामीण ट्रैक्टर व थ्रेसर संचालकों की आय में भी कई गुना की वृद्धि दर्ज की गई है।
पराली के व्यावसायिक उपयोग से बदला ग्रामीण अर्थशास्त्र:
विगत वर्षों की तुलना में इस बार ग्रामीण क्षेत्रों में सरसों की फसल कटाई के दौरान एक बिल्कुल नया आर्थिक समीकरण देखने को मिल रहा है। पूर्व में किसानों को अपने खेतों से सरसों निकलवाने के लिए थ्रेसर व ट्रैक्टर संचालकों को औसतन 1300 रुपये प्रति घंटे की दर से भुगतान करना पड़ता था। सामान्यतः दो घंटे के कार्य में 20 से 22 क्विंटल सरसों निकलती थी, जिस पर किसान की जेब से सीधे 2600 रुपये खर्च होते थे। इसके अतिरिक्त, खेत में बची हुई पराली को हटाने या नष्ट करने की एक अलग परेशानी बनी रहती थी।
वर्तमान में ईंट भट्टों में सरसों की पराली की मांग चरम पर पहुंचने के कारण ट्रैक्टर चालकों ने किसानों को अनोखा प्रस्ताव दिया है। अब थ्रेसर चालक पराली के बदले ही किसानों की सरसों की फसल की बिल्कुल मुफ्त मड़ाई (थ्रेसिंग) कर रहे हैं। इसके साथ ही, किसानों को प्रति बीघा के हिसाब से 1000 रुपये का अतिरिक्त नकद लाभ भी दिया जा रहा है। यानी अब किसान को फसल मड़ाई के लिए अपनी जेब से एक भी पैसा खर्च नहीं करना पड़ रहा है।
दूसरी ओर, ट्रैक्टर संचालक खेतों से प्राप्त इस पराली को 300 से 400 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से स्थानीय ईंट-भट्टा संचालकों को बेच रहे हैं। इस प्रकार, जो थ्रेसर चालक पहले दो घंटे ट्रैक्टर चलाकर किसान से मात्र 2600 रुपये की कमाई कर पाते थे, वे अब उसी समय में उत्पादित होने वाली लगभग 30 क्विंटल पराली को ईंट भट्टों पर बेचकर 10,000 से 12,000 रुपये तक का बंपर मुनाफा कमा रहे हैं।
तेलीय प्रकृति के कारण ईंट भट्टों की बनी पहली पसंद:
ईंट-भट्टा संचालकों के तकनीकी विश्लेषण के अनुसार, सरसों की पराली स्वभाव से थोड़ी तेलीय (Oily) होती है, जिसके कारण यह बेहद तीव्रता से आग पकड़ती है और लंबे समय तक उच्च तापमान बनाए रखती है। ईंटों को पकाने के लिए यह कोयले और लकड़ी की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी और किफायती ईंधन सिद्ध हो रही है। भट्टा स्वामियों के अनुसार, पहले प्रति एक लाख ईंटों को पकाने में ईंधन पर 25 से 30 हजार रुपये का व्यय आता था, जो अब इस पराली के उपयोग से घटकर मात्र 20 हजार रुपये रह गया है।
क्या कहते हैं क्षेत्र के प्रगतिशील किसान:
सुरेंद्र सिंह, स्थानीय किसान "पहले हमें फसल के बाद बची पराली को नष्ट करने के लिए खेतों में ही जलाना पड़ता था, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति भी प्रभावित होती थी और प्रदूषण भी होता था। अब थ्रेसर संचालक पराली के बदले मुफ्त में सरसों निकाल रहे हैं और साथ में प्रति बीघा ₹1000 भी दे रहे हैं। इसने हमारी खेती की लागत को ऐतिहासिक रूप से कम कर दिया है।"
वीरसिंह, स्थानीय किसान "अब सरसों की मड़ाई के समय किसान को लेबर (मजदूरों) की व्यवस्था भी नहीं करनी पड़ती। थ्रेसर संचालक पराली के सौदे के तहत सरसों निकलवाने में लगने वाली संपूर्ण लेबर का खर्च स्वयं वहन करते हैं। यह क्षेत्र के किसानों के लिए एक क्रांतिकारी राहत है।"
खैरथल क्षेत्र का यह अभिनव कृषि-औद्योगिक मॉडल आज पूरे प्रदेश के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन चुका है। यह व्यवस्था 'वेस्ट टू वेल्थ' (कचरे से कंचन) के सिद्धांत को चरितार्थ करते हुए पर्यावरण संरक्षण (पराली दहन से मुक्ति), किसानों की आय में वृद्धि, ग्रामीण रोजगार सृजन और औद्योगिक लागत में कमी सुनिश्चित कर एक आदर्श पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण कर रही है।


