संतोषी जीवन जीने का प्रयास करेः आचार्य लब्धिवल्लभसूरीजी; कालन्द्री में आचार्य की त्रिदिवसीय वाचना शुरु

Jul 3, 2026 - 19:37
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संतोषी जीवन जीने का प्रयास करेः आचार्य लब्धिवल्लभसूरीजी; कालन्द्री में आचार्य की त्रिदिवसीय वाचना शुरु

आचार्य श्री लब्धिवल्लभसूरीजी के आगमन से गूंजा उज्ज्वला फार्म हाउस, 'संयम' और 'चैतन्य स्पर्श' पर दिया पावन पाथेय

सिरोही, (राजस्थान) आचार्यदेव श्री लब्धिवल्लभसूरीजी महाराज साहेब के पावन सानिध्य में त्रि-दिवसीय वाचना शिविर का भव्य शुभारंभ शुक्रवार प्रातः 9 बजे प्रकृति की गोद में स्थित 'उज्ज्वला फार्म हाउस' पर हुआ। आगामी रविवार तक चलने वाले इस शिविर के प्रथम दिन चर्तुविध संघ सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के मांगलिक प्रवचनों का लाभ उठाया।

  • गाजे-बाजे और मंगल कलश से हुआ 'सामैया'

इससे पूर्व, आचार्यश्री एवं उनके विशाल साधु-साध्वी समुदाय के फार्म हाउस आगमन पर भव्य स्वागत किया गया। फार्म हाउस के मालिक और जैन फाउंडेशन के संस्थापक श्रेष्ठीवर्य रमेश कुमार प्रेमचंदजी शाह परिवार ने गाजे-बाजे के साथ अगवानी की। बालिकाओं ने सिर पर मंगल कलश धारण कर और अक्षत से वधामणा कर पूज्य भगवंतों का हर्षोल्लास के साथ स्वागत (सामैया) किया। आचार्यश्री ने शाह परिवार के फार्म हाउस में अपने पावन पगलिये (चरण स्पर्श) कर मांगलिक आशीर्वाद प्रदान किया। तत्पश्चात, परिसर में बने बांस के आकर्षक व कलात्मक जैन मंदिर में मूलनायक परमात्मा श्री आदिनाथ भगवान के दर्शन-पूजन के बाद वाचना शिविर का विधिवत आरंभ हुआ।

  • 'मैं' (अहंकार) ही क्रोध और मोह की जड़: आचार्यश्री

शिविर की प्रथम वाचना “प्रभु का श्रामण एवं जीवन का चैतन्य स्पर्श” विषय पर देते हुए आचार्यश्री लब्धिवल्लभसूरीजी ने फरमाया कि व्यक्ति को जीवन में कभी भी गुस्सा या नाराजगी व्यक्त नहीं करनी चाहिए। मानव जीवन में जो कुछ भी मिला है, वह प्रभु की असीम कृपा और पूर्व पुण्यों का ही प्रतिफल है, इसलिए संतोषी जीवन जीना ही सबसे बड़ा सुख है।

अहंकार पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति लगातार समाज में 'मैं कौन हूँ' साबित करने की जो कोशिश करता है, वही गलत है। यह 'मैं' (अहंकार) ही इंसान को क्रोध, मोह, माया और अभिमान के दलदल में धकेलता है। मानव भव की सार्थकता इसी में है कि हम अपने व्यवहार, विचार और निष्ठा से सर्व-कल्याण के कार्य करें। ज्ञान, दर्शन और चारित्र के माध्यम से धर्म आराधना कर स्वयं के अवगुणों पर विजय प्राप्त करनी होगी।

सांसारिक और संयम जीवन का भेद समझाते हुए पूज्य श्री ने स्पष्ट कहा कि— "सांसारिक जीवन दुःख पैदा करता है, जबकि संयम का जीवन दुःखों का समूल नाश करता है।"

  • 30 वर्ष का संयम जीवन एक अमिट कहानी

आचार्यश्री के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए जैन फाउंडेशन के संस्थापक रमेश कुमार पी. शाह ने कहा कि संपूर्ण समुदाय ने अल्पायु में संयम मार्ग अपनाकर जैन शासन को एक नई दिशा दी है। आचार्यश्री आगम, न्याय और काव्य के प्रकांड ज्ञाता हैं। चाकण की धरा पर वैराग्य धारण कर शुरू हुई उनकी 30 वर्षों की संयम यात्रा 'जन्म से अजन्मा' बनने का एक प्रेरणादायी इतिहास है। उन्होंने संघ की महातपस्वी और साहित्य प्रेमी साध्वीवृंद के प्रति भी कोटि-कोटि वंदन किया।

  • प्रवासी बंधुओं की गरिमामयी उपस्थिति

इस पावन प्रसंग पर कालन्द्री जैन संघ के अध्यक्ष भरत संघवी, सिरोही के रमेश कोठारी, महावीर जैन, कोल्हापुर के वरुण जैन, कालन्द्री की श्रीमती उज्ज्वला शाह सहित दक्षिण भारत से पधारे अनेक प्रवासी जैन धर्मावलंबी और कालन्द्री क्षेत्र के श्रावक-श्राविकाएं बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

उल्लेखनीय है कि यह पावन कृषि भूमि पूर्व में भी 40 साध्वियों के अकस्मात चातुर्मास, आचार्यश्री रत्नाकरसूरीजी, गिरनार गौरव आचार्यश्री हेमवल्लभसूरीजी जैसी महान विभूतियों की तप-साधना और स्वाध्याय की साक्षी रही है। यहाँ मंदिर, उपाश्रय और ठहरने के लिए कॉटेज की उत्तम व्यवस्था की गई है।

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