जून सूखा, जुलाई में कम बारिश का अलर्ट, मानसून का ऐसा हाल ,समुद्र के तापमान में बदलाव
जयपुर (कमलेश जैन) जुलाई का महीना शुरू हो चुका है। मौसम विज्ञानियों ने इस महीने में बहुत कम बारिश का अलर्ट जारी किया है। लगभग पूरा जून महीना मानसून के इंतजार में गुजर गया। ऐसे में सूखे की आशंका सताने लगी है। अगर बारिश नहीं हुई तो केवल फसलों का उत्पादन ही नहीं, बहुत कुछ प्रभावित होगा। मंहगाई भी तेजी से बढ़ेगी। अनाज का आयात करना पड़ सकता है। प्रकृति किसी न किसी रूप में अपना रूप दुनिया भर को दिखा रही है। बारिश में भीग जाने वाले इलाके जून महीने में सूखे में गुजर गये। मानसून हर साल लगभग जून महीने में आ जाता है। कई बार तो मई के अंत में ही दस्तक दे देता है।
इस साल जून सूखा क्यों रहा?
कई कारणों ने मिलकर जून को सूखा बना दिया। सबसे बड़ा कारण समुद्र के तापमान में बदलाव है। अगर समुद्र सतह का तापमान सामान्य से ऊपर या नीचे चलता है तो मानसून प्रभावित होता है। दूसरा कारण वायु वेग की कमजोरी है।मानसूनी हवाओं में ताकत नहीं रही। यह बारिश लाने वाले बादलों को जन्म नहीं दे पाई। जेट स्ट्रीम्स और उच्च दबाव का प्रभाव भी एक बड़ा कारण है। ऊपरी वायुमंडल में बदलाव से मौसम के पैटर्न बदल जाते हैं। इन सब के साथ स्थानीय परिस्थितियां, जैसे भूमि की नमी और तापमान, भी कम बारिश में योगदान देती हैं। बीते 125 साल में इस साल पांचवां सबसे सूखा जून रहा है।इससे भयावहता का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
जुलाई में कम बारिश का अलर्ट क्यों दिया जा रहा है?
मौसम वैज्ञानिक जुलाई के लिए कम बारिश की चेतावनी दे रहे हैं। आकलन है कि जुलाई में बारिश का दीर्घकालिक औसत काफी कम रहने वाला है। इसके पीछे समुद्र में बने तापमान असंतुलन, वैश्विक पैटर्न एल नीनो आदि का असर हो सकता है। मानसून की दक्षिणी-पूर्वी दिशा कमजोर दिख रही है। ये सब मिलकर अगले महीनों में बारिश कम होने का संकेत दे रहे हैं। जुलाई का महीना ज्वार बाजरा धान, मक्का, कपास, सोयाबीन, अरहर समेत कई फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि इन्हें पानी ज्यादा चाहिए होता और बारिश से यह जरूरत पूरी होती है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का कहना है कि अगले कुछ दिनों में देश के कई हिस्सों में अच्छी बारिश हो सकती है। जहां बारिश हो जाएगी, वहां तो ठीक लेकिन जहां नहीं होगी, वहाँ की फसलें प्यासी रह जाएंगी।
मौसम विभाग का कहना है, जुलाई में कम बारिश होगी।
जलवायु परिवर्तन का दीर्घकालिक प्रभाव: ग्लोबल वार्मिंग से मौसम कठिन हो रहा है।चक्र अब अस्थिर हुए हैं।कभी अधिक वर्षा और कभी सूखा, गर्मी बढ़ने से समुद्र और वायुमंडल की ऊर्जा बदलती है इससे मानसून का समय और तीव्रता प्रभावित होती है। दीर्घकाल में बदलती स्थितियां मानसूनी पैटर्न में अनिश्चितता बढ़ा देती हैं।
कृषि और जल संसाधनों पर क्या असर होगा?
कम बारिश का सीधा असर फसल पर होगा। खरीफ फसलों में बुवाई और बढ़वार प्रभावित हो सकती है। छोटे किसान सबसे अधिक प्रभावित होंगे। पानी की कमी से पेयजल और सिंचाई भी प्रभावित होंगी नदियों और झीलों का जलस्तर घट सकता है। इससे शहरों और गाँवों, दोनों को समस्या होगी।
सरकार और प्रशासन क्या कर सकते हैं?
सरकारें अलर्ट जारी कर सकती हैं। जल भंडार और बांधों का प्रबंधन कर सकते हैं।सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं। फसल बीमा और राहत पैकेजों की व्यवस्था पहले से ही कर सकते हैं। सिंचाई परियोजनाओं को प्राथमिकता देना ऐसे कठिन समय में श्रेयस्कर होगा। छोटे किसानों को तकनीकी सहायता और बीज उपलब्ध कराने पर विचार करना होगा।
मानसून की कमजोरी के कई कारण होते हैं। इनमें महासागरीय तापमान, वैश्विक पैटर्न, वायुमंडलीय ब्लॉक, और जलवायु परिवर्तन शामिल हैं।जून का सूखा और जुलाई में कम बारिश का अलर्ट इन कारणों का नतीजा हो सकता है। इनके प्रभाव गंभीर हो सकते हैं।पर तैयारी से नुकसान कम किया जा सकता है। सरल जल बचत और कृषि उपाय तुरंत उपयोगी होंगे।


