दसलक्षण पर्व का दूसरा दिन उत्तम मार्दव धर्म के रूप में मनाया गया
लक्ष्मणगढ़ (अलवर/ कमलेश जैन) आचार्य मुनि श्री ज्ञान भूषण जी रत्नाकर द्वारा बताया गया कि उत्तम मार्दव जिसका अर्थ है मान या घमंड का नाश करना। आज के दिन जैन धर्म के अनुयायी विनम्रता, दया और आत्मशुद्धि पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वह अहंकार को त्यागकर सभी जीवों के प्रति दयालु और नम्र स्वभाव अपनाने का संकल्प लेते हैं।
- उत्तम मार्दव धर्म के लक्षण
मान का नाश: - इस दिन व्यक्ति अपने मन से घमंड और अहंकार को दूर करने का प्रयास करता है।
विनम्रता और मृदुता: - व्यवहार में विनम्रता और मन में कोमलता अपनाई जाती है।
दया का भाव: - सभी जीवों के प्रति करुणा और दया का भाव रखा जाता है।
आत्मशुद्धि:- आत्मशुद्धि के लिए यह दिन समर्पित होता है, जिसमें व्यक्ति अपनी कमियों और पापों के लिए पश्चाताप करता है।
मैं और मेरापन का त्याग: - 'मैंऔर'मेरा जैसे स्वार्थी भावों का त्याग करके समभाव अपनाना मार्दव का एक हिस्सा है।
- दसलक्षण पर्व का उद्देश्य
जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति: -इस पर्व का मुख्य उद्देश्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होना है।
आत्मशुद्धि और पापों से क्षमा: -अनुयायी आत्मशुद्धि करते हैं और पूरे वर्ष किए गए पापों के लिए क्षमा मांगते हैं।
पाप कर्मों से मुक्ति: -पर्व के दौरान व्यक्ति अपने कर्मों को शुद्ध करता है और भविष्य में होने वाले पापों से बचने का प्रयास करता है।
जैन धर्म में दशलक्षण पर्व (10 लक्षण पर्व) यह जैन धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पर्व है, जिसे पर्युषण के उपरांत मनाया जाता है। इसका महत्व आत्मा की शुद्धि और मोक्ष मार्ग की साधना में अत्यंत गहरा है।