कृषि विज्ञान केंद्र नौगाँवा द्वारा उन्नत बीजों का किया प्रदर्शन सरसों, बरसीम और जई की उन्नत किस्मों से किसानों को अधिक उत्पादन की दिखाई राह
रामगढ़ अलवर (राधेश्याम गेरा)
राष्ट्रीय नवाचार जलवायु अनुकूल कृषि परियोजना (निक्रा) के अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्र नौगाँवा द्वारा गोद लिए गाँव में किसानों के लिए उन्नत किस्मों का प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस अवसर पर सरसों की राधिका, बरसीम की बी.एल.-43 और जई की केंट किस्मों के प्रदर्शन के लिए बीज दिए गए।
वैज्ञानिकों ने दी तकनीकी जानकारी
केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. सुभाष चंद्र यादव ने किसानों को बीजोपचार की महत्ता पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बीजोपचार करने से फसल की अंकुरण क्षमता बढ़ती है और पौधों को शुरुआती अवस्था में रोग व कीटों से सुरक्षा मिलती है। उन्होंने बताया कि गेहूँ और जौ के बीजों का उपचार कार्बेन्डाजिम या थायरम से लगभग 2 से 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से करना चाहिए। चना के बीजों को थायरम या कैप्टान से 2.5 से 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से तथा ट्राइकोडर्मा से लगभग 4 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। इसके बाद राइजोबियम तथा पी.एस.बी. जैसे जैव उर्वरकों का लेप करना बहुत लाभकारी रहता है।
सरसों के बीजों का उपचार भी थायरम या कैप्टान से 2.5 से 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से करना चाहिए, जिससे अल्टरनेरिया ब्लाइट और अन्य बीजजनित रोगों से बचाव होता है। इसी प्रकार बरसीम में कार्बेन्डाजिम और जई में थायरम या कैप्टान का बीजोपचार करने से अंकुरण अच्छा होता है और रोगों का प्रकोप कम होता है।
डॉ. हंसराम माली (विषय विशेषज्ञ-सस्य विज्ञान) ने किसानों को रबी मौसम की फसलों की बुवाई की तकनीक पर विस्तार से बताया। उन्होंने समय पर बुवाई, पंक्ति में बुवाई, संतुलित खाद प्रबंधन और सल्फर की महत्ता पर जोर दिया। साथ ही उन्होंने फसल चक्र अपनाने, हरी खाद डालने तथा राइजोबियम, पी.एस.बी., अजोटोबैक्टर जैसे जैव उर्वरकों के प्रयोग की सलाह दी। केंद्र के वरिष्ठ अनुसंधान अध्येता पुष्कर देव ने किसानों को बदलते मौसम और जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप खेती करने के तरीके बताए। उन्होंने कहा कि किसान मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही खाद और उर्वरक डालें। बिना परीक्षण के उर्वरक देने से लागत बढ़ती है और मिट्टी की उर्वरता भी प्रभावित होती है। उन्होंने सीमित पानी की स्थिति में जल्दी पकने वाली किस्में अपनाने और बरसीम, जई जैसी चारा फसलें पशुपालन को सशक्त बनाती हैं, जिससे दूध उत्पादन बढ़ता है और किसानों की आय में भी वृद्धि होती है। डॉ. पूनम (विषय विशेषज्ञ) ने किसानों को प्राकृतिक खेती के महत्व पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती से मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है, उत्पादन लागत घटती है और फसलें रसायनमुक्त होकर अधिक स्वास्थ्यवर्धक बनती हैं। उन्होंने किसानों को गोबर, गोमूत्र, नीम की खली, जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत जैसे प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इससे न केवल फसलों का स्वास्थ्य बेहतर होता है, बल्कि पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है और किसानों की आमदनी में स्थिरता आती है। इस कार्यक्रम में कुल 67 महिला एवं पुरुष किसानों ने भाग लिया और वैज्ञानिकों से विस्तृत जानकारी प्राप्त की। किसानों ने कहा कि इस प्रकार के प्रदर्शन से उन्हें नई किस्मों और वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी मिलती है, जिससे वे अपनी खेती को और अधिक टिकाऊ और लाभकारी बना सकते हैं।