गोविंदगढ़ में श्रीमद्भागवत कथा, श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह प्रसंग सुनाया: उद्धव-गोपी संवाद, कंस वध की कथा सुन भाव विभोर हुए श्रोता
गोविंदगढ़ के रामबास स्थित श्री कलाधारी आश्रम में सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। छठवें दिन भागवताचार्य पंडित नृत्यगोपाल शास्त्री ने उद्धव-गोपी संवाद, भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कंस वध, जरासंध युद्ध और श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह का वर्णन किया। इस दौरान श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह प्रसंग में श्रोता भक्त बाराती बनकर झूम उठे।
कथा में बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने बड़े होने पर कंस का वध कर अपने माता-पिता देवकी और वासुदेव को कारागार से मुक्त कराया। कंस वध से क्रोधित उसके ससुर मगध नरेश जरासंध ने श्रीकृष्ण से प्रतिशोध लेने के लिए मथुरा पर सत्रह बार आक्रमण किया। प्रत्येक बार भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने उसे पराजित किया, लेकिन उसका वध नहीं किया।
बलराम जी द्वारा जरासंध का वध न करने का कारण पूछने पर श्रीकृष्ण ने बताया कि जरासंध अपने जैसे अन्य अधर्मी राजाओं को साथ लेकर युद्ध करने आता है। इससे उन्हें अधर्मी राजाओं का संहार करने के लिए कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
अठारहवीं बार के आक्रमण के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरावासियों को द्वारका में ले जाकर बसाया। कथा में भगवान श्रीकृष्ण के गुरुकुल जाने, कालिया नाग का वध और जरासंध युद्ध सहित अन्य लीलाओं का भी वर्णन किया गया।
इस दौरान कथा व्यास पंडित नृत्यगोपाल शास्त्री ने भक्तों को सनातन धर्म की महत्वपूर्ण शिक्षाएं दीं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक सनातनी को अपने जीवन में पांच प्रमुख ग्रंथों का अध्ययन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि इन्हीं से धर्म का सही ज्ञान प्राप्त होता है।
कथावाचक ने भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन और रासलीला का सजीव वर्णन करते हुए बताया कि भगवान का मिलन केवल पुकारने से होता है, खोजने से नहीं। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के चार मार्ग बताए: दुःखी, जिज्ञासु, सनातनी और ज्ञानी।