नारी तू नारायणी, बेटी है तो कल है; बेटी है तो संसार है- गुर्जर
भीलवाड़ा (बृजेश शर्मा) आज का युग नव निर्माण का युग है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, नैतिक, शैक्षणिक सभी स्तरों पर नारी के सहयोग की अपेक्षा है। आज की शिक्षित नारियों को समाज के नये पथ का निर्माण करना होगा। पथ को सुगम व आध्यात्मिक बनाना होगा। नारी की सबल प्रेरणा पुरूष को नव शक्ति से भर देगी किन्तु इसके लिए आवश्यक है कि पुरूष को आत्म बल, तप बल व चरित्र बल से महान बनना होगा। विश्व व समाज को उज्ज्वल भविष्य की ओर उन्मुख करना है, समाज को श्रेष्ठ बनाना है तो नारी को उसकी स्वाभाविक सृजनशील एवं संवेदना के साथ सम्पूर्ण योग्यता को विकसित कर उन्हें कर्मक्षेत्र की ओर अग्रसित होने का अवसर देना होगा।
नारी सशक्तिकरण के इस दौर में प्रत्येक क्षेत्र में अपनी सफलता का परचम लहराया है। फिर भी यह विचारणीय बिन्दु है कि हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति निम्न क्यों ? क्यों आज भी हमारे समाज में गिनी चुनी प्रसिद्ध महिला हस्तियों के नाम ही सामने आते है ? आज भी हम समाज की महिला प्रतिभाओं के नाम अगुंलियों पर गिन सकते है। ऐसा क्यों ? आज हमारे समाज में महापुरूषों और प्रतिभावान व्यक्तियों की परम्परा रूक सी गई है। इतने बड़े समाज में महिला प्रतिभाओं की कमी नहीं है, परन्तु आवश्यकता है उन प्रतिभाओं को निखारनें की। जिस प्रकार समुद्र में गहरे पैठने से ही मोती मिलते है उसी प्रकार प्रतिभा का विकास भी किया जाए। महिलाओं को शिक्षा रूपी प्रयास करना होगा तब ही प्रतिभा रूपी मोती मिल पायेंगे। स्वर्ण से कुंदन की तरह प्रतिभा का विकास हो पायेगा। अतः आज महत्ती आवश्यकता है कि हम महिला प्रतिभाओं की खोज करें, उनको प्रौत्साहित करें, शिक्षा के लिए प्रेरित करें। उन्हें अपनी प्रतिभाओं को विकसित करने का पूर्ण अवसर दे ताकि घर-परिवार के साथ समाज का भी विकास हो सके। हमें ऐसी प्रतिभावान नारियों की आवश्यकता है जो महिला कल्याण के लिए परम उपयोगी और अति महत्वपूर्ण कार्यों के लिए अपनी भावना और शक्ति का बहुत बड़ा अंश समर्पित कर सकें।
किसी भी देश या समाज के पास कितने ही संसाधन हो, पुरूष वर्ग कितना ही शिक्षित, सभ्य और प्रबुद्ध क्यों न हो लेकिन यदि उस समाज की महिलाएँ अशिक्षित, असंस्कृत व मुढ़ रहेगी तब तक वह समाज सभ्य, शिक्षित और समुन्नत नहीं हो पायेगा। उन्नत व विकसित समाज का निर्माण तभी होगा जब पुरूष व महिला समान रूप से शिक्षित होंगें। डॉ. राधाकृष्णन कहते है कि:- नारी पुरूष के विलास का माध्यम नहीं है। वह पुरूष की माँ है, और मानव के विकास का साधन है। अतः हमें बालिका शिक्षा के लिए विशेष प्रयास करना होगा। क्योंकि एक लड़की दो परिवारों से जुड़ी होती है। नेपोलियन बोनार्पाट ने कहा था- तुम मुझे अच्छी शिक्षित माँ दो मैं तुम्हें अच्छा राष्ट्र दूँगा। समाज की तरक्की तभी संभव है जब लड़कियाँ शिक्षा की ओर अग्रसर होगी। एक शिक्षित माँ सौ शिक्षकों के बराबर है। वह अपने बच्चों को अच्छे संस्कार व सही मार्ग दिखाती है। समाज की उन्नति भी नारी के सम्मान और शिक्षा मे निहित है। मानव जाति में नारी शक्ति को देवी के रूप में प्रतिस्थापित करके ही हम धरती पर स्वर्ग को अवतरित कर सकते है। कहा भी गया है-
यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवता।।
नर व नारी परमेश्वर का रूप है। एक दूसरे के पूरक है। गाड़ी के दो पहियों के समान है। हम परमपिता परमेश्वर के बाद सर्वाधिक ऋणी है तो नारी के क्योंकि प्रथम परमात्मा तो हमें जीवन देता है, उस जीवन को साकार रूप में जीवनदान नारी ही देती है। समाज की उन्नति के पथ पर अग्रसर हो तब रथ के दोनों पहियों के साथ आगे बढ़ना होगा। अतः नारी को भी संकोच व भय छोड़कर महिला उत्थान व उत्कर्ष के अभियान में सम्मिलित होना होगा। नारी का अंतः स्फुरण समाज के हित के लिए अदम्य उत्कण्ठा के रूप में उभरेगा। विश्व को चकाचौंध कर देने वाले अगणित रत्न अनायास ही प्राप्त हो जायेंगे। नारी के त्याग व बलिदान में कोई कमी नहीं है। पति व बच्चों के लिए वह सारा जीवन समर्पित कर देती है।
नारी समर्पण व त्याग की प्रतिमूर्ति है। वह अपने स्वत्व के बल पर भगवान को भी प्राप्त कर सकती है। नारी अपने शौर्य, साहस के बल का परिचय देकर दुर्गावती, झाँसी की रानी, अहिल्या बाई बन सकती है तो मातृत्व की मिठास घोल कर जीजाबाई। नारी जीवन की ज्योति है, प्राणों का संसार है। नारी आद्यशक्ति है, सृष्टि को उत्पन्न करने वाली है। अपने स्तर के अनुरूप परिवार तथा भावी पीढ़ी का सर्जन करने वाली है।
नारी अपने दुशमनों के लिए दुर्गा है ,अपमान का बदला लेने वाली काली है , ज्ञान की भण्डार सरस्वती है, भोजन बना कर खिलाने वाली अन्नपूर्णा है, उसे कमजोर न समझे वह अपने प्रेम समर्पण और त्याग से परिवार बनाती है | कई कमियों के बाद भी रिश्तो को निभाती है | धैर्य की प्रतिमूर्ति है | उसकी भावनाओं को कमज़ोरी ना समझों| वह हर परिस्थिति को सहन कर लेती है | दर्द को मुस्कराहट में तब्दील कर लेती है | उसके चरित्र पर ऊँगली न उठाओ | उसकी धैर्य और सतीत्व के बल से तुम भस्म हो जाओगे | नारी का अपमान बर्बरता का प्रतीक है। इस दिव्य चेतना शक्ति को यदि प्रताड़ित किया जाये, अपमानित किया जाये, शोषित किया जाये तो यह विनाशता का सूचक है। जब यह क्रोधित होती है तो उसकी आँखों से बरसता हुआ अभिशाप दमयन्ती के रूप में, महिषाषुर मर्दिनी रणचण्डी के रूप में, रावण को मौत के घाट उतारने वाली सीता के रूप में, कौरवों का अवसान करवाने वाली द्रौपदी के रूप में प्रकट होता है।
नारी का सम्मान करे उनका अपमान तुम्हारी नीच परवरिश और संस्कार की कमी को प्रदर्शित करता है | नारी त्याग व समर्पण की प्रतिमा है, परन्तु समर्पण भी अंधा व अविवेकपूर्ण नहीं होना चाहिए। समर्पण कोई विवशता नहीं व्यक्तित्व की उत्कृष्ठता है। प्रत्येक पुरूष न तो ईश्वर है न ही देवदूत। अतः श्रेष्ठता के लिए उसे प्रयास करना होगा। श्रेष्ठ व्यक्तियों से ही श्रेष्ठ समाज बनेगा। इसके लिए नर व नारी का परस्पर सामंजस्य व सहयोग आवश्यक है। सामूहिक प्रयत्नों से ही यह संभव हो सकेगा। अपने राष्ट्र का मंगल, समाज का कल्याण, वैयक्तिक हित को ध्यान में रखते हुए नारी को अज्ञान के अंधकार से निकलकर प्रकाश में लाना होगा, चेतना विकसित करके उन्हें शिक्षित करना होगा। समाज व परिवार के लोगों को बालिका शिक्षा के लिए उचित प्रयास करना होगा। उन्हें हरसंभव मदद देकर शिक्षा की ओर अग्रसर करना होगा। नारी का अपमान,पर्दा प्रथा का त्याग, अंधविश्वासों का बहिष्कार, विवाहोत्सव में अपव्यय इत्यादि का विरोध करके समाज को सही राह देकर विकसित करना होगा।