लक्ष्मणगढ़ में धड़ल्ले से बिक रही पॉलीथिन: पर्यावरण के लिए बन रही नासूर, गोवंश की जान पर मंडराया खतरा
लक्ष्मणगढ़ (अलवर) कमलेश जैन
प्रदेश भर में पॉलीथिन पर पूर्ण प्रतिबंध होने के बावजूद लक्ष्मणगढ़ कस्बे सहित पूरे तहसील क्षेत्र में इसका धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है। नियमों की अनदेखी के चलते न केवल पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि कस्बे की सफाई व्यवस्था चरमराने के साथ-साथ बेसहारा पशुधन के लिए भी यह जानलेवा साबित हो रहा है।
गोवंश के लिए मौत का सामान बन रही पॉलीथिन
कस्बे में घूमने वाले बेसहारा पशुओं के लिए पॉलीथिन की थैलियां ज़हर बनती जा रही हैं। लोग घरों से निकलने वाली जूठन और खाने-पीने का कचरा पॉलीथिन की थैलियों में बांधकर फेंक देते हैं, जिसे भूखे आवारा पशु कचरे के साथ खा जाते हैं। पशुओं के पेट में जाने वाली ये थैलियां उनकी पाचन शक्ति को पूरी तरह प्रभावित कर रही हैं, जिससे गोवंश गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहा है।
जाम नालियां और चरमराती सफाई व्यवस्था
कस्बे के कई हिस्सों में नाले और नालियां पॉलीथिन से पटी पड़ी हैं। लोग घरों का कचरा पॉलीथिन में भरकर नालियों में डाल देते हैं, जिससे जल निकासी पूरी तरह बाधित होती है। बरसात के दिनों में यही पॉलीथिन जलभराव और गंदगी का कारण बनती है, जिससे गंदे पानी और मच्छरों के प्रकोप के कारण बीमारियों का अंदेशा बना रहता है।
भूमि और पर्यावरण को भी पहुंच रहा गंभीर नुकसान
विशेषज्ञों और समाजसेवियों का कहना है कि पॉलीथिन न केवल दिखने में गंदगी फैलाती है, बल्कि इसे जमीन में दबाने से मिट्टी की उर्वरता भी खत्म होती है और भूजल दूषित होता है। चाय के कप, पानी की बोतलें और थैलियां खुले में फेंकने से धीरे-धीरे यह पूरे पर्यावरण और जनस्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा रही है।
प्रशासनिक सख्ती और जन-जागरूकता की दरकार
स्थानीय नागरिकों और समाजसेवियों ने मांग की है कि प्रशासन को इस पर सख्त रुख अपनाना चाहिए और प्रतिबंधित कैरी बैग बेचने वालों पर कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही, जब तक आम नागरिक खुद आगे आकर पॉलीथिन का उपयोग बंद नहीं करेंगे, तब तक इस समस्या से निजात पाना मुश्किल है।

