कक्षा 7 की हिंदी पुस्तक में ‘मेरी भावना’ पर गलत जानकारी का मामला:जैन पत्रकार महासंघ ने की तथ्यात्मक जांच की अपील,बिना पुष्टि खबर फैलाने से बचने की सलाह
इंदौर / जयपुर (कमलेश जैन) । मध्यप्रदेश की कक्षा सातवीं की हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘भाषा भारती’ में जैन धर्म के प्रख्यात विद्वान पंडित जुगल किशोर मुख्तार ‘युगवीर’ की प्रसिद्ध प्रार्थना ‘मेरी भावना’ को लेकर पिछले दिनों राजस्थान के एक पत्रकार द्वारा सोशल मीडिया पर गलत जानकारी प्रसारित होने का मामला सामने आया है। उक्त खबर में कविता की पंक्तियां बदले जाने और रचनाकार का नाम गलत लिखे जाने का दावा किया गया था। हालांकि, मूल पाठ्यपुस्तक की पड़ताल और राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT), भोपाल से चर्चा के बाद इन दावों की पुष्टि नहीं हुई।
मध्यप्रदेश पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति के सदस्य डॉ. अनुपम जैन इन्दौर ने संबंधित शैक्षणिक पक्ष से चर्चा कर स्पष्ट किया कि पाठ्यपुस्तक में ‘मेरी भावना’ को लेकर बताई गई कथित त्रुटियां नहीं हैं।
डॉ. अनुपम जैन ने SCERT भोपाल से चर्चा कर की पुष्टि
मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्यप्रदेश पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति के स्थाई सदस्य डॉ. अनुपम जैन इन्दौर ने भोपाल में SCERT से चर्चा कर वास्तविक स्थिति की जानकारी प्राप्त की। इस चर्चा में पाठ्यपुस्तक में ‘मेरी भावना’ की पंक्तियों में बदलाव और रचनाकार का नाम गलत दर्ज होने संबंधी दावों की पुष्टि नहीं हुई।
डॉ. जैन को रचना के स्रोत और पाठ्यपुस्तक में इसे शामिल किए जाने के आधार के संबंध में भी जानकारी उपलब्ध कराई गई।
डॉ. अनुपम जैन की इस पहल से स्पष्ट हुआ कि किसी भी शैक्षणिक या धार्मिक विषय पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया देने से पहले मूल दस्तावेजों और संबंधित संस्थान से तथ्यों की पुष्टि करना आवश्यक है। पाठ्यपुस्तक में कथित गलतियों की खबर प्रकाशित होने के बाद अब यह जानना भी जरूरी है कि इन दावों का आधार क्या था और क्या खबर जारी करने से पहले मूल पुस्तक का मिलान किया गया था।
मूल पुस्तक में कविता और रचनाकार का नाम सही
जैन पत्रकार महासंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजेंद्र जैन महावीर सनावद, (मप्र) ने वास्तविक पाठ्यपुस्तक का अध्ययन कर मामले की पड़ताल की। इसमें सामने आया कि कक्षा सातवीं की हिंदी पुस्तक ‘भाषा भारती’ के पाठ क्रमांक एक में ‘मेरी भावना’ कविता के रूप में प्रकाशित है। रचनाकार के रूप में ‘जुगल किशोर युगवीर’ का नाम दर्ज है। कविता में कुल 20 पंक्तियां प्रकाशित हैं और अंत में रचनाकार का संक्षिप्त परिचय भी दिया गया है।
भाषा भारती पुस्तक के संयोजन में साक्षी जैन तथा लेखकगण में राजकुमारी जैन, सौभाग्यमल जैन और डॉ. इंदुबाला पाटनी के नाम दर्ज हैं। पुस्तक मध्यप्रदेश पाठ्यपुस्तक स्थायी समिति से अनुमोदित है। डॉ. अनुपम जैन इस समिति के सदस्य हैं। मूल पुस्तक के निरीक्षण और SCERT से हुई चर्चा के आधार पर कविता की पंक्तियों तथा रचनाकार के नाम में कथित गड़बड़ी के दावों की पुष्टि नहीं हुई।
17 अक्टूबर को इंदौर में संतों के मंच से उठा था मामला
इस प्रकरण ने उस समय गंभीर रूप ले लिया था, जब 17 अक्टूबर को इंदौर में आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज और मुनि पुंगव श्री सुधा सागर जी महाराज के सान्निध्य में आयोजित कार्यक्रम के मंच से भी यह विषय उठाया गया था। उस दौरान पाठ्यपुस्तक में कथित छेड़छाड़ को लेकर शासन-प्रशासन के प्रति नाराजगी व्यक्त की गई थी।
ऐसे में वास्तविक पाठ्यपुस्तक की पड़ताल के बाद समाज के सामने सही तथ्य रखना आवश्यक हो गया है। धार्मिक और शैक्षणिक विषयों पर अपुष्ट जानकारी प्रसारित होने से समाज में भ्रम पैदा हो सकता है और संबंधित संस्थानों के प्रति अनावश्यक नाराजगी भी बढ़ सकती है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यात्मक जांच जरूरी है।
‘मेरी भावना’ मानवता के कल्याण की प्रार्थना
पंडित जुगल किशोर मुख्तार ‘युगवीर’ की ‘मेरी भावना’ जैन साहित्य की महत्वपूर्ण रचना है। इसमें जीवदया, करुणा, सहिष्णुता, परोपकार, नैतिकता और विश्वबंधुत्व जैसे सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों की अभिव्यक्ति है। इसकी भावना किसी एक समाज या संप्रदाय तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण से जुड़ी है।
ऐसी महत्वपूर्ण रचना को लेकर समाचार प्रकाशित करते समय मूल पाठ, रचनाकार का नाम और अधिकृत स्रोत की जांच करना पत्रकारिता की बुनियादी जिम्मेदारी है। यदि किसी को पाठ्यपुस्तक में त्रुटि होने की आशंका है, तो संबंधित पृष्ठों का मिलान कर शिक्षा विभाग या पाठ्यपुस्तक से जुड़े अधिकृत संस्थान से पुष्टि की जानी चाहिए।
जैन पत्रकार महासंघ ने की तथ्य-जांच की अपील
जैन पत्रकार महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेश जैन तिजारिया, उपाध्यक्ष राजेंद्र जैन महावीर सनावद और राष्ट्रीय महामंत्री उदयभान जैन जयपुर ने पत्रकारों, सामाजिक संगठनों तथा धार्मिक संस्थाओं से आग्रह किया है कि किसी भी खबर को प्रकाशित करने या उस पर प्रतिक्रिया देने से पहले उसकी तथ्यात्मक पुष्टि अवश्य करें। विशेष रूप से धार्मिक साहित्य, शिक्षा और पाठ्यपुस्तकों से जुड़े मामलों में मूल दस्तावेजों का अध्ययन और संबंधित विभाग से जानकारी लेना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का उद्देश्य समाज में भ्रम फैलाना नहीं, बल्कि प्रमाणित तथ्यों के आधार पर सही जानकारी पहुंचाना है। यदि किसी खबर के कारण गलतफहमी पैदा हुई हो, तो वास्तविक तथ्यों को भी समान गंभीरता से समाज के सामने रखा जाना चाहिए।

