अयोध्या में त्रिदिवसीय शरद पूर्णिमा महोत्सव का भव्य शुभारंभ: गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी के 93वें जन्मोत्सव और 75वें संयम दिवस पर उमड़े श्रद्धालु

Oct 25, 2026 - 19:19
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अयोध्या में त्रिदिवसीय शरद पूर्णिमा महोत्सव का भव्य शुभारंभ: गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी के 93वें जन्मोत्सव और 75वें संयम दिवस पर उमड़े श्रद्धालु

अयोध्या / कमलेश जैन : रायगंज स्थित दिगम्बर जैन मंदिर, बड़ी मूर्ति, अयोध्या में जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के 93वें जन्मोत्सव एवं 75वें संयम दिवस के उपलक्ष್ಯ में त्रिदिवसीय शरद पूर्णिमा महोत्सव का विधिवत शुभारंभ झंडारोहण के साथ किया गया। कुलाधिपति सुरेश जैन-मुरादाबाद और प्रकाशचंद बड़जात्या-चेन्नई के करकमलों द्वारा झंडारोहण किया गया, जिसके बाद भगवान के अभिषेक व पूजन के साथ धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत हुई।

सर्वजातीय सम्मेलन और माताजी का संदेश: महोत्सव के प्रथम दिन दिगम्बर जैन सर्वजातीय सम्मेलन का आयोजन तीन सत्रों में किया गया, जिसमें देश भर से लगभग 40 संगठनों के अध्यक्ष और 1000 से अधिक प्रतिनिधि शामिल हुए। कार्यक्रम का दीप प्रज्ज्वलन पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी, भट्टारक अरिहंतकीर्ति जी और अन्य गणमान्य अतिथियों द्वारा किया गया।

इस अवसर पर पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अपने आशीर्वचन में आह्वान किया कि "अपनी-अपनी जातियों के संगठनों को सशक्त बनाएं, क्योंकि मजबूत संगठनों से ही समाज की पहचान और अस्तित्व सुरक्षित रहेगा." उन्होंने आचार्य वीरसगर जी महाराज के वचनों को स्मरण कराते हुए गृहस्थ जीवन के साथ सप्तपरमस्थान के चिंतन और अपनी जाति में ही विवाह संस्कार पर जोर दिया। सर्वजातीय संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पीठाधीश रविन्द्रकीर्ति स्वामीजी ने कहा कि हम जाति में अलग हैं, लेकिन संगठन और एकता में एक हैं।

विभिन्न जातियों के इतिहास और योगदान पर मंथन: सम्मेलन के दौरान अग्रवाल, खंडेलवाल, हुमड़, बघेरवाल, जैसवाल, सेतवाल, चतुर्थ एवं पंचम, खरोआ, पपोरवाड़, वरैया, काम्बोज, कठनेरा, पद्मावती पुरवाल और गोलालारिय सहित विभिन्न जातियों के प्रमुखों ने अपने समाज के इतिहास, वर्तमान जनसंख्या और गौरवशाली परंपराओं पर प्रकाश डाला। इस दौरान प्रसिद्ध फिल्म गायक चिंतन बाकीवाला द्वारा माताजी पर केंद्रित एक सुंदर भजन प्रस्तुत किया गया, जिसका लोकार्पण अतिथियों ने किया। कार्यक्रम का संचालन हसमुख जैन गांधी और डॉ. जीवन प्रकाश जैन ने किया।

माताजी का प्रेरणादायी जीवन और राष्ट्र को योगदान: उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के टिवैतनगर ग्राम में जन्मीं गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी ने बाल्यकाल में ही गुरु देशभूषण जी महाराज से ब्रह्मचर्य और आचार्य वीरसगर जी से आर्यिका दीक्षा ग्रहण की। उन्होंने पिछले कई दशकों में लगभग 500 ग्रंथों का सृजन किया है, जो भगवान महावीर के बाद 2500 वर्षों के इतिहास में किसी भी साध्वी द्वारा रचित सबसे विराट साहित्य है। हस्तिनापुर के जम्बूद्वीप रचना, मांगीतुंगी में 108 फीट की विशाल पाषाण प्रतिमा, और शाश्वत तीर्थ अयोध्या के विकास में उनका अभूतपूर्व योगदान रहा है।

युवा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री उदयभान जैन ने बताया कि महोत्सव के अगले क्रम में 26 अक्टूबर को भगवान ऋषभदेव की बड़ी प्रतिमा का महामस्तिकाभिषेक और विभिन्न अवार्ड समर्पण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

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