खैरथल में जाम का कोहराम, आखिर कब मिलेगा आराम

Jan 2, 2026 - 09:06
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खैरथल में जाम का कोहराम, आखिर कब मिलेगा आराम

खैरथल (हीरालाल भूरानी )  आजादी के 75 वर्षों बाद आज देश जहां आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, वहीं खैरथल कस्बा अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। कभी जिले की शान समझा जाने वाला यह कस्बा कमजोर, निरीह, लाचार, बेबस, बदहवास सा अपने रहनुमाओं की तलाश मे भटकता सा लगने लगा है। कस्बे के बीचो बीच से निकल रही रेल्वे लाईन खैरथल की लाइफ लाइन है, क्योंकि यातायात का यही एक मात्र सुगम साधन है यहां। बस अड्डा अथवा सरकारी बस सेवा तो सपना सा लगने लगा है। जिला मुख्यालय अलवर तक जाने के लिए भी रोडवेज सेवा उपलब्ध नहीं है तो यातायात का हाल समझ सकते हो कैसा होगा।
ऐसे में एकमात्र सहारा यह रेलवे लाइन ही है। इसलिए भी यह रेलवे लाइन खैरथल के लिए जीवन रेखा है क्योंकि इसी रेलवे लाइन से खैरथल कस्वा दिल्ली, जयपुर, अहमदाबाद, जोधपुर, उदयपुर, पंजाब, हिमाचल, जम्मू कश्मीर आदि के साथ देश के कोने कोने से लगभग जुड़ गया है। अब तो जयपुर होकर दक्षिण भारत के लिए भी ट्रेन उपलब्ध होने लगी है। आजादी के 75 सालों बाद रेलवे ने भी विकास की रफ्तार पकड़ी। जहां देश भर में रेलवे का आधुनिकतम विकास हुआ है, वही खैरथल से निकल रही दिल्ली अहमदाबाद लाइन का भी दोहरीकरण होने के साथ विद्युतीकरण भी हुआ है। इससे ना केवल ट्रेनों को गति मिली है बल्कि सुविधाएं भी ज्यादा उपलब्ध होने की उम्मीद जगी है, लेकिन विकास की यह धारा खैरथल के लिए नासूर भी बन रही है। दोहरीकरण और विद्युतीकरण के बाद इस लाइन पर सवारी गाड़ियों के अलावा दिन भर में अनेक माल गाडयां गुजरती है, जिससे रेलवे फाटक लगभग बंद सा नजर आता है। खैरथल की भौगोलिक स्थिति ही कुछ इस प्रकार की है कि पूरा करवा पटरी के आर और पार बसा हुआ है। ऐसे में सारा दिन अथवा बार-बार रेलवे फाटक का बंद होना मतलब लोगों के लिए अवरोध उत्पन्न होना। पटरी के दोनों ओर अनेक स्कूल है, सरकारी और निजी हॉस्पिटल है, बिजली घर का दफ्तर है, कई बैंक और सरकारी ऑफिसेज है। सबसे बड़ी बात कि यह रोड एमडीआर 25 है। मतलब भिवाड़ी से कोटपूतली की ओर जाने वाला मुख्य रोड है और इसी रोड से भारी भरकम वाहन भी गुजर रहे हैं। भीमकाय विशाल ट्रक, भरे पूरे लोडिंग ट्रैक्टरों के साथ प्राइवेट बसें, स्कूल की बसें, निजी वाहन सबका बोझ इस एक इकलौते रोड पर है, जिसके बीच में यह रेलवे फाटक है। रेलवे फाटक बंद होने से जहां पूरे दिन जाम की समस्या रहती है, वही सबसे बड़ी समस्या तो स्कूल आने वाले वाहनों के लिए है। स्कूल की बसें जब ग्राम में फंसती हैं और गर्मी का माहौल हो तो छोटे छोटे, हे मुझे बच्चे कैसे उस तपती धूप में बस में बैठे जाम मुलने का इंतजार करते हैं या फिर किसी मरीज को कर कोई एंबुलेंस जा रही हो और वह जाम में फंस जाए तो हालात कैसे हो सकते हैं ये आप समझ सकते । कहने को तो बेतरतीब तरीके से बना एक अंडरपास की है, मगर भारी भरकम वाहनों और आस पास क्षेत्रों सहित लाखों की आबादी से घिरे खैरथल कस्बे की भीड़ को यह अंडरपास सहन नहीं कर पाता और इसमें भी जाम लग जाता है।

बरसों पुरानी खैरथल की एक मांग है बाईपास
       वैसे तो खैरथल का कोई रहनुमा नेता है ही नहीं, जो कस्बे की मांग को पूरा करवा सके अथवा विधानसभा में मामला उठा सके। सरकार चाहे किसी की भी रही हो, कांग्रेस अथवा भाजपा हो, यहां से विधायक चाहे कोई भी रहा हो, चाहे यहां से मंत्री बने हो, चाहे अनेक मंत्रियों की खैरथल तक पैठ रही हो, मगर ट्रेफकि व्यवस्था और हाईटेक विकास के नाम पर सिफर। पिछली सरकार के दौरान मंजूर एक बाईपास का काम शुरू भी हुआ तो रेलवे ओवरब्रिज को लेकर मामला अटक गया। अब राज्य में सरकार कांग्रेस की, केंद्र में बीजेपी की। दोनों का एक दूसरे पर दोषारोपण और फंस गया बेचारा सखैरथल। क्या दोष केवल नेताओं का माना जाए ? क्या यहां की मूकदर्शक बनी जनता की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। यहां की जनता ने कभी विकास को लेकर कोई पुरजोर मांग उठाई हो, कोई आंदोलन किया हो, कोई पत्र व्यवहार किया हो, ऐसा नजर तो नहीं आता। कहते हैं बिना रोए तो मां भी बच्चे की भूख को समझ नहीं पाती है. फिर बिना किसी पुरजोर मांग के यहां विकास की उम्मीदें क्यों ?

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