विकास की वेदी पर बलि चढ़ती प्रकृति: राजस्थान में 3 साल में काटे गए 28 लाख पेड़, उत्तरजीविता सुनिश्चित हो तब बचेगा नेचुरल इकोसिस्टम -- राम भरोस मीणा
विकास की वेदी पर बलि चढ़ती प्रकृति: राजस्थान में 3 वर्षों में काटे गए 28 लाख पेड़, सरकारी पौधारोपण के 'ढाक के तीन पात'
जयपुर (राजस्थान) जंगल प्राकृतिक स्वर्ग है। प्रकृति ने हमें स्वच्छ सुंदर हरा-भरा मनभावन प्राकृतिक वातावरण उपहार स्वरूप दिया है। प्रकृति प्रदत्त संसाधनों पर जीव - जन्तुओं, पशु - पक्षियों, मानव का बराबर अधिकार है। लेकिन मानव ने अपने को सर्वोपरि और श्रेष्ठ मानते हुए सर्वाधिक उपभोक्ता होने के साथ अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का विनाश किया। परिणाम स्वरूप वर्तमान में ईकोसिस्टम पूरी तरह गड़बड़ा गया और पर्यावरणीय नुकसान से लोगों को विवशता में कष्ट सहना पड़ रहा है। हालात यह हो गये हैं जिसके चलते लाखों लोग बेघरबार हुए, जंगलों में निवास करने वाले जन जातीय समुदायों के रोजगार खत्म हुए, अनेकों प्रजातियों के पक्षियों, वन्यजीवों की प्रजातियां ख़तरे में पड़ गयीं हैं। यह कटु सत्य है कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड में खनन के नाम पर पर्यावरण को भारी नुक्सान हुआ है।
राजस्थान में सोलर पैनल लगाने, शहरों के विस्तार, सड़कों के निर्माण, औद्योगिक इकाइयों की स्थापना के नाम पर 2023 से 2026 के मध्य 28 लाख पेड़ काटने की अनुमति दी गई, जिसमें सर्वाधिक खेजड़ी के पेड़ काटे गए हैं। पश्चिम राजस्थान में पेड़ों की कटाई से वहां के तापमान में वृद्धि हुई, अरावली पर्वत माला के साथ छेड़छाड़ से पर्यावरणीय संतुलन डगमगाने लगा। हिमालय क्षेत्रों में सड़कों के विस्तार, पर्यटन, शहरीकरण के नाम पर वनों का दोहन हुआ, जिससे आठ हिमालय क्षेत्रों में वन क्षेत्र कम हुए। अण्डमान निकोबार में पर्यटन ने वनों का विनाश किया। वन वनस्पतियों वन क्षेत्रों के साथ बड़ते घात से पीने योग्य पानी की कमी आई है, मौसम चक्र गड़बड़ाने लगा है, नदियां खत्म होने लगी हैं, परम्परागत व्यवसाय प्रभावित हुए हैं, लोगों के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ने लगा है जो चिंतनीय विषय है।
औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, सड़कों का निर्माण, खनन, विधुत उत्पादन, बांध निर्माण के नाम पर लाखों - करोड़ों पेड़ों की कटाई हो रही है। सरकार और समाज दोनों द्वारा नुकसान की भरपाई करने के वास्ते नए पौधे लगाए जा रहे हैं। इस वर्ष भी राजस्थान में करोड़ों पौधें लगाएं जाएंगे, लेकिन "ढाक के तीन पात" वाली कहावत पूरी तरह यहां चरितार्थ होती है। क्योंकि पौधे लगने के कुछ समय बाद ही देख भाल के अभाव में मर जाते हैं। अक्सर वैसे भी सरकारी स्तर पर लगाएं गए पौधे 30 से 40 प्रतिशत ही जीवित रह पाते हैं। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता।
समुदायों द्वारा लगाए गए 50 से 60 प्रतिशत और सुरक्षा बलों तथा स्वैच्छिक संगठनों द्वारा लगाए गए पौधों के 90 प्रतिशत पौधे जीवित रहते हैं, क्योंकि वे अपना दायित्व ईमानदार तरीके से निर्वाह करते हैं। जबकि सरकारी स्तर पर लगाए पौधों के साथ औपचारिकताएं ज्यादा होती हैं, दायित्व कम। इससे ख़ाली हुए जंगलों की आपूर्ति ना होकर नेचुरल इकोसिस्टम गड़बड़ाता हैं। लोगों में हीनभावना पैदा होती है और पेड़ों का विनाश बढ़ता है। इसका विपरीत प्रभाव पड़ा है। इससे बचने के लिए ठोस क़दम उठाने के साथ उत्तरजीविता सुनिश्चित होनी चाहिए, नीतियों में बदलाव होना चाहिए, योजनाओं- परियोजनाओं का पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए, जिससे विकास के नाम पर हुयी प्राकृतिक क्षति की पुनः पूर्ति हो सकें और विनाश से बचा जा सके।
यही नही पेड़ों का ट्रांसप्लांटेशन हो - सड़कों के निर्माण, शहरों- कस्बों के विस्तार, औद्योगिक इकाइयों की स्थापना के समय जो पेड़ काटे जाते हैं, उन्हें काटने के बजाय उनका ट्रांसप्लांटेशन किया जाएं, जिससे प्रति वर्ष लाखों पेड़ों को बचाया जा सकता है। नीम, पीपल, बरगद, गुलर, धोक, शहतूत, बेर सहित छोटे झाड़ी नुमा सभी पेड़ों को दूसरे स्थान पर पुनः रोप कर बचाया जा सकता है। पर्यावरणीय दृष्टि से पेड़ों का ट्रांसप्लांटेशन होना श्रेष्ठ है, बजाय नए पौधे लगाने से।
उत्तरजीविता सुनिश्चित हो। जबकि देखा गया है कि सरकारी योजनाओं, अभियानों के माध्यम से प्रत्येक वर्ष करोड़ों पौधे लगा कर उनकी हत्या कर दी जाती है। दरअसल पौधे लगने के बाद सही मोनेट रिंग का अभाव होता है। पिछले वर्षों में करोड़ों पौधें लगाएं गए, जबकि जमीनी स्तर पर वे बहुत कम दिखाई देते हैं। हकीकत यह है कि 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान केवल सेल्फी लेने तक ही सिमट गया है। सरकार की माने तो राजस्थान मे इस वर्ष लगभग दस करोड़ पौधे लगाए जाएंगे, लेकिन पौधे लगाने से पर्यावरणीय संतुलन नहीं बनता, पौधों से पेड़ बनाने पर नेचुरल इकोसिस्टम में सुधार होगा और उसके लिए उत्तरजीविता सुनिश्चित होना जरूरी है, जिसे पौधे लगने से पहले लागू किया जाना चाहिए।
जरूरी है कि वृक्षारोपण हेतु सेना, अर्धसैनिक बलों, स्वैच्छिक संगठनों को प्रोत्साहित किया जाए। देखा गया है कि वन क्षेत्रों के संरक्षण, वृक्षारोपण, पेड़ों की सुरक्षा को लेकर पिछले एक दशक से विभिन्न अभियानों, योजनाओं, परियोजनाओं में सेना, अर्धसैनिक बलों, स्वैच्छिक संगठनों, समुदायों द्वारा लगाए गए पौधों में 90 प्रतिशत पेड़ बनें है जबकि सरकारी स्तर पर लगाएं पौधों में 30 प्रतिशत ही पौधे विकास कर सकें है, जो नगण्य है। इन परिस्थितियों में केन्द्रीय व राज्य सरकारों द्वारा कार्यों का विशेष अवलोकन करने के साथ सरकारी स्तर पर लगाए पौधों के लुप्त होने की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। दूसरा श्रेष्ठ वृक्षारोपण करने वाले संगठनों को ग्राम, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे वे और लगन, ऊर्जा के साथ अच्छे से कार्य कर सकें और प्राकृतिक संतुलन बना रह सके। यदि यह हो सका तो बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।
( लेखक एल पी एस विकास संस्थान अलवर के प्रमुख एवं पर्यावरणविद् हैं। )


