रैणी में उपखण्ड स्तरीय 12वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर शिविर आयोजित, योग को बताया जीवन का संपूर्ण विज्ञान

Jun 21, 2026 - 19:29
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रैणी में उपखण्ड स्तरीय 12वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर शिविर आयोजित, योग को बताया जीवन का संपूर्ण विज्ञान

रैणी (अलवर/कमलेश जैन) आयुष मंत्रालय (भारत सरकार) के राष्ट्रीय आयुष मिशन एवं आयुर्वेद, योग व प्राकृतिक चिकित्सा यूनानी एवं होम्योपैथी (आयुष) विभाग राजस्थान के सौजन्य से स्थानीय राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में उपखण्ड स्तरीय 12वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का भव्य आयोजन किया गया। प्रात:कालीन वेला में आयोजित इस विशेष योग शिविर में प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और आमजन ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

शिविर में पतंजलि वैलनेस के मुख्य योगाचार्य केदार नाथ शर्मा ने उपस्थित संभागियों को योग, प्राणायाम और आसन की विभिन्न क्रियाओं का अभ्यास कराया। इस दौरान सहयोगी शिक्षक सोनू प्रजापत ने भी योग क्रियाओं के प्रदर्शन में सहयोग दिया। कार्यक्रम के सफल संचालन में नोडल अधिकारी पूरण मल, ब्लॉक मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. आर. एस. मीना, सहायक विकास अधिकारी ध्यानी राम तथा सहायक प्रोग्रामर अजय तिवाड़ी की मुख्य भूमिका रही। इस अवसर पर प्रधान शशीकांत एवं श्री गोविंद देव परोपकारी सचिव सहित कई गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

  • योग मात्र व्यायाम नहीं, संपूर्ण चिकित्सा शास्त्र: डार्विन

कार्यक्रम के दौरान डार्विन ने योग के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, "योग मात्र एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति या शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि यह जीवन दर्शन, आत्मानुशासन और एक संपूर्ण जीवन पद्धति है। यह व्याधि मुक्त (रोगमुक्त) और समाधि युक्त जीवन की संकल्पना है।"

उन्होंने आगे कहा कि एलोपैथी की तरह योग कोई लाक्षणिक चिकित्सा नहीं है, बल्कि यह रोगों के मूल कारण को दूर कर हमें भीतर से स्वस्थ बनाता है। योग को किसी वर्ग विशेष की पूजा-पद्धति या संकीर्ण दृष्टिकोण से देखना अनुचित है। स्वार्थ, अहंकार और अज्ञान से ऊपर उठकर इसे एक संपूर्ण विज्ञान के रूप में अपनाया जाना चाहिए।

  • अष्ट चक्र जाग्रत करता है योग

पौराणिक मान्यताओं का हवाला देते हुए डार्विन ने बताया कि योग के माध्यम से शरीर के अष्ट चक्र जाग्रत होते हैं। वहीं, निरंतर प्राणायाम के अभ्यास से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के संचित अशुभ संस्कार और पाप परिक्षीण (नष्ट) होते हैं। यह आत्मोपचार एवं आत्मदर्शन की श्रेष्ठ आध्यात्मिक विद्या है, जो व्यक्ति का समग्र रूपांतरण कर उसे अविकसित से विकसित श्रेणी में ले जाती है।

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