शरद पूर्णिमा पर कठूमर में गूंजे 'जय श्री कृष्णा' के जयकारे: बैंड-बाजे और डीजे की धुन पर निकली भव्य रथयात्रा, श्रद्धालुओं ने लगाई कस्बे की परिक्रमा

Oct 26, 2026 - 16:44
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शरद पूर्णिमा पर कठूमर में गूंजे 'जय श्री कृष्णा' के जयकारे: बैंड-बाजे और डीजे की धुन पर निकली भव्य रथयात्रा, श्रद्धालुओं ने लगाई कस्बे की परिक्रमा

शरद पूर्णिमा पर कठूमर में निकली भगवान श्रीकृष्ण की भव्य रथयात्रा, श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से लगाई कस्बे की परिक्रमा

कठूमर। (दिनेश लेखी)

कस्बे में शरद पूर्णिमा के पावन पर्व पर प्रतिवर्ष की भांति इस बार भी धार्मिक श्रद्धा, उल्लास और अटूट आस्था के साथ पूरे कस्बे की परिक्रमा का आयोजन किया गया। इस पावन अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण की नयनविराम रथयात्रा निकाली गई, जिसमें उमड़े श्रद्धालुओं के हुजूम से पूरा कठूमर क्षेत्र 'जय श्री कृष्णा' और 'राधे-राधे' के जयकारों से गुंजायमान हो उठा।

 बैंड-बाजे और डीजे की धुन पर भक्तिमय हुआ माहौल

आयोजन के दौरान बैंड-बाजे और डीजे पर बज रहे श्रीहरि के मधुर भजनों और भक्तिमय धुनों पर महिला व पुरुष श्रद्धालु पूरी तन्मयता के साथ थिरकते हुए नजर आए। भगवान श्रीकृष्ण का सुसज्जित रथ इस यात्रा और परिक्रमा का मुख्य आकर्षण रहा, जिसके दर्शन के लिए मुख्य रास्तों पर लोगों का तांता लगा रहा। श्रद्धालुओं ने रथयात्रा का स्थान-स्थान पर स्वागत किया और भगवान श्रीकृष्ण की आराधना कर सुख-समृद्धि की कामना की।

 सामाजिक एकता और परंपरा का दिखा अनूठा उदाहरण

हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा को आध्यात्मिक रूप से अत्यंत पवित्र माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार इस रात्रि में चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होकर अमृत वर्षा करता है, वहीं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा रची गई महारास की स्मृति में भी यह पर्व बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

कठूमर में इस अवसर पर आयोजित होने वाली यह परिक्रमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि कस्बे की अनूठी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। परिक्रमा में महिलाओं और पुरुषों की बड़ी संख्या में सामूहिक भागीदारी ने सामाजिक एकजुटता, भाईचारे और अपनी समृद्ध परंपराओं को जीवंत रखने का एक सशक्त संदेश दिया।

 नई पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ने का प्रयास

शरद पूर्णिमा पर आयोजित इस पारंपरिक परिक्रमा में बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक का उत्साह देखते ही बन रहा था। स्थानीय निवासियों का कहना है कि सामूहिक रूप से आयोजित ऐसे धार्मिक कार्यक्रमों से न केवल कस्बे का वातावरण धर्ममय और सकारात्मक बनता है, बल्कि नई पीढ़ी को भी अपनी पौराणिक संस्कृति और संस्कारों से जुड़ने की सीख मिलती है।

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