गिरमिटिया मजदूरों के शोषण के ख़िलाफ़ गाँधी जी का संघर्ष
गाँधी जयन्ती पर विशेष
उदयपुरवाटी (सुमेरसिंह राव) सन् 1860 से 1911 के मध्य ब्रिटिश उपनिवेशकों ने अपने अधीन फ़िजी मारिशस गायना टोबैको ट्रिनिडाड दक्षिणी अफ़्रीका आदि देशों में गन्ने के खेतों व रेल परियोजनाओं को पूरा करने हेतु एक लिखित अनुबंध के अंतर्गत भारतीय मजदूरों को ले जाया गया ।एग्रीमेंट का अपभ्रंश शब्द गिरमिट हो गया इस प्रकार उन्हें गिरमिटिया मजदूर कहा जाने लगा ।
गाँधी जी ने इंग्लैंड से बैरिस्टर की उपाधि प्राप्त की थी पोरबंदर के दक्षिण अफ्रीकी व्यापारी दादा अब्दुला झावेरी के क़ानूनी मामले में सहायता करने के लिये वे 1893 मई में दक्षिणी अफ़्रीका गये रेल का प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद उन्हें उस डिब्बे से सामान सहित नीचे उतार दिया ।इस घटना के कारण उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के ख़िलाफ़ संघर्ष करने का मानस बना लिया था ।
इस आन्दोलन के दौरान उन्होंने गिरमिटिया मजदूरों की दुर्दशा व भारतीय समुदाय के साथ अन्याय को मिटाने के लिये सत्याग्रह किया भारतीय समुदाय को एकजुट किया ।उस समय भारतीयों को अपनी पहचान के लिये एक पहचान पत्र दिया जाता था उस क़ानून का विरोध किया।नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की ।गांधीजी जब 1896 में वापस दक्षिणी अफ़्रीका आये तो श्वेत लोगों ने भारी विरोध प्रदर्शन किया ।
21 वर्ष बाद भारत आकर गांधी जी ने 1916 में कांग्रेस अधिवेशन में गिरमिटिया प्रथा के विरोध में प्रस्ताव पारित करवाया जिसके कारण 1917 में इस प्रथा को समाप्त कर दिया गया ।
- लेखक मंगलचन्द सैनी पूर्व तहसीलदार के ये विचार निजी है