मृत व्यक्तियों के बिना दावे वाले बैंक अकाउंट्स की जानकारी उनके वारिसों को क्यों नहीं दी जा सकती? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और RBI से पूछा.

Mar 20, 2026 - 18:27
Mar 20, 2026 - 18:28
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मृत व्यक्तियों के बिना दावे वाले बैंक अकाउंट्स की जानकारी उनके वारिसों को क्यों नहीं दी जा सकती? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और RBI से पूछा.

दिल्ली (कमलेश जैन) सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) से पूछा कि मृत व्यक्तियों के बैंक खातों की जानकारी उनके वारिसों को क्यों नहीं दी जा सकती, ताकि वे उन खातों में जमा बिना दावे वाली रकम  को हासिल कर सकें।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच 2022 में दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका वित्तीय पत्रकार और 'मनी लाइफ' की मैनेजिंग एडिटर सुचेता दलाल ने दायर की थी। इस याचिका का विषय निवेशकों और जमाकर्ताओं की वह बिना दावे वाली रकम थी, जिस तक उनके असली कानूनी वारिसों की पहुंच नहीं है।
दलाल की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक बड़ी समस्या तब खड़ी होती है, जब मृत व्यक्ति के वारिसों को यह पता ही नहीं होता कि उनके कितने खाते या फंड बिना दावे के रह गए। उन्होंने कोर्ट को बताया कि इस PIL के ज़रिए यह निर्देश देने की मांग की गई कि ऐसे बिना दावे वाले खातों की जानकारी सार्वजनिक की जाए।
इस पर जस्टिस मेहता ने बीच में टोकते हुए पूछा कि अगर ऐसे बिना दावे वाले फंड या खातों की जानकारी सार्वजनिक कर दी गई तो इससे ऑनलाइन जालसाज़ और धोखेबाज़ सक्रिय हो सकते हैं। वे खुद को वारिस बताकर उस रकम पर दावा कर सकते हैं।
भूषण ने इसका जवाब देते हुए कहा कि RBI ने भी एक 'केंद्रीयकृत और खोजने योग्य डेटाबेस' बनाने की ज़रूरत बताई थी, जिसकी मदद से लोग अपने मृत माता-पिता के खातों का पता लगा सकें। भूषण ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता सिर्फ़ बैंकों के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य प्रतिभूतियों, बीमा और डाकघर खातों के लिए भी ऐसे केंद्रीयकृत डेटाबेस की माँग कर रहा है।
भूषण ने यह भी बताया कि कई तरह के कल्याणकारी फंड की रकम भी इन्हीं बिना दावे वाले खातों में जमा हो गई। बिना दावे वाली यह कुल रकम 'बहुत बड़ी' है और एक लाख पचास हज़ार करोड़ रुपये से भी ज़्यादा है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमण ने बेंच को 'जमाकर्ता शिक्षा और जागरूकता फंड'  के बारे में जानकारी दी। इस फंड में उन अकाउंट्स की रकम जमा कर दी जाती है, जो 10 साल से बिना दावे के पड़े होते हैं। इस रकम का इस्तेमाल जन-जागरूकता और वित्तीय साक्षरता से जुड़ी योजनाओं को चलाने के लिए किया जाता है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता इस सार्वजनिक योजना में पैसे के हस्तांतरण (Transfer) को चुनौती नहीं दे रहा है।
उन्होंने आगे बताया कि अगर कोई असली वारिस सामने आता है तो उस फंड से उसे उसकी रकम वापस कर दी जाती है। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि इस PIL याचिका में इस मुद्दे से जुड़ा कोई भी आँकड़ा पेश नहीं किया गया।
जस्टिस मेहता ने तब पूछा,
"मान लीजिए किसी व्यक्ति के 10 अलग-अलग देशों में 10 अलग-अलग खाते हैं, और उसकी बिना वसीयत किए मौत हो जाती है तो उसके वारिसों को खातों की जानकारी कैसे मिलेगी? हो सकता है कि उसने KYC न करवाया हो।"
ASG ने ज़ोर देकर कहा कि ये ऐसे मुद्दे हैं जो नीतिगत दायरे में आते हैं।
जस्टिस मेहता ने टिप्पणी की कि मृतक के वारिसों को खातों की जानकारी देना नीतिगत दायरे का मुद्दा नहीं है।
"यह नीति का सवाल नहीं है; हम यह नहीं कह रहे हैं कि अकाउंट्स का ट्रांसफर अवैध है। हम तो बस यह कह रहे हैं कि अगर हम कानूनी वारिसों को जानकारी दे दें तो इसमें गलत क्या है? इसमें क्या दिक्कत है?"
ASG ने जवाब दिया कि जानकारी को सार्वजनिक दायरे में लाने में कई तरह की बाधाएं हैं, जैसे कि निजता का अधिकार और जानकारी के दुरुपयोग की आशंका।
RBI की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट रंजीत कुमार ने दलील दी कि ऐसे मामलों में 'सेंट्रल KYC' की सुविधा पहले से ही मौजूद है।
उन्होंने आगे कहा,
"अभी पैसा बैंक के पास एक ट्रस्ट (अमानत) के तौर पर जमा है। इसलिए एक ट्रस्टी होने के नाते अगर मैं पैसे का दावा करने वाले व्यक्ति से संतुष्ट नहीं हूँ—सिर्फ़ एक क्षतिपूर्ति बांड (Indemnity Bond) देने भर से..."
खंडपीठ ने केंद्र सरकार और RBI को 4 हफ़्तों के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
इस मामले की अगली सुनवाई 5 मई को होगी।

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