हाईकोर्ट की फुल बेंच का बड़ा फैसला: नियमित होने से पहले कैजुअल रेल कर्मी की मौत पर परिजनों को नहीं मिलेगी पेंशन

Sep 22, 2026 - 08:29
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हाईकोर्ट की फुल बेंच का बड़ा फैसला: नियमित होने से पहले कैजुअल रेल कर्मी की मौत पर परिजनों को नहीं मिलेगी पेंशन

नियमित या अस्थाई पद पर नियुक्ति से पहले मौत पर कैजुअल रेल कर्मियों के परिजन पेंशन के हकदार नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट

जोधपुर(राजस्थान)।

 राजस्थान हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय फुल बेंच ने रेलवे के कैजुअल कर्मचारियों की पेंशन और पारिवारिक लाभों से जुड़े सालों पुराने कानूनी विवाद का अंत कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल, न्यायाधीश विनीत कुमार माथुर और न्यायाधीश मुन्नुरी लक्ष्मण की पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी 'अस्थाई दर्जा प्राप्त' कैजुअल कर्मचारी की किसी नियमित या स्वीकृत अस्थाई पद पर नियुक्ति से पूर्व ही मृत्यु हो जाती है, तो उनके परिजन या विधवाएं पेंशन का दावा नहीं कर सकतीं। कोर्ट ने अल्मा व अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं को खारिज करते हुए यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया।

क्या था पूरा मामला?

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ताओं के पति उत्तर रेलवे के जोधपुर मंडल में कैजुअल गैंगमैन और सब्स्टीट्यूट खलासी जैसे पदों पर कार्यरत थे। सेवा काल के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई थी। जब रेलवे प्रशासन ने उनके परिजनों को पेंशन देने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) में शरण ली। वहां से राहत न मिलने पर परिजनों ने हाईकोर्ट का रुख किया। वर्ष 2003 में एक पूर्व निर्णय पर पुनर्विचार के लिए इस मामले को तीन जजों की फुल बेंच को भेजा गया था।

रेलवे मैनुअल और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सीनियर पैनल काउंसिल प्रकाश चौधरी ने पक्ष रखा। फुल बेंच ने माना कि सुप्रीम कोर्ट ने चंदा देवी मामले (2008) में इस कानूनी स्थिति को पहले ही स्पष्ट कर दिया था।

'इंडियन रेलवे एस्टेब्लिशमेंट मैनुअल' (IREM) के पैरा 1501 का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने पाया कि 'अस्थाई रेलवे कर्मचारी' की परिभाषा में कैजुअल लेबर शामिल नहीं हैं, भले ही उन्हें अस्थाई दर्जा क्यों न मिला हो।

न्यायालय का निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि चूंकि याचिकाकर्ताओं के पतियों की मृत्यु किसी स्वीकृत अस्थाई या नियमित पद पर आसीन होने से पहले ही हो गई थी, इसलिए वे रेलवे नियमावली के तहत पेंशन पाने की पात्रता नहीं रखते थे। इसी वैधानिक स्थिति के आधार पर अदालत ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।

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