लक्ष्मणगढ़ में भगवान आदिनाथ का ज्ञान कल्याणक बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया
लक्ष्मणगढ़ (अलवर/कमलेश जैन) लक्ष्मणगढ़ (अलवर) कस्बे में चल रहे पंचकल्याणक महोत्सव के चतुर्थ दिन आज पूर्ण विधि विधान से भगवान का अभिषेक किया गया। धार्मिक मंत्र उच्चारणों के साथ भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) का ज्ञान कल्याणक मनाया गया।
ज्ञान कल्याणक जैन धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र घटना है, जो उनके सांसारिक मोह-माया त्यागकर मुनि दीक्षा लेने और घोर तपस्या के आरंभ का प्रतीक है। अयोध्या धर्म नगरी पंडाल मेंधार्मिक ज्ञान कल्याणक का नाटक का भी मंचन किया गया। धार्मिक नाटक को देखकर लोग मंत्र मुग्ध हो गए ।
दीक्षा और वन गमन: वैराग्य होते ही उन्होंने अपने पुत्रों (भरत और बाहुबली) को राज्य सौंप दिया और दीक्षा लेने का निर्णय लिया । वे अपने साथ चार हजार राजाओं के साथ अयोध्या के 'सिद्धार्थ वन में पहुंचे और वटवृक्ष के नीचे दीक्षा ग्रहण की ।
कठोर तपस्या और उपवास: दीक्षा के पश्चात् भगवान आदिनाथ ने लगातार 1 वर्ष (छह माह की दो अवधियों में) तक बिना आहार-पानी के घोर तपस्या की । इस दौरान उन्होंने मौन रहकर आत्म-ध्यान किया ।
प्रथम आहार: पूरे एक वर्ष की कठोर तपस्या के बाद, वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) के दिन हस्तिनापुर के राजा श्रेयांश ने उन्हें पड़गाहन करके गन्ने के रस (इक्षुरस) का आहार दान दिया था, जो जैन धर्म में आहार विधि का एक बड़ा प्रसंग है । यह क्रियाएं आज संपन्न हुई।
पंचकल्याणक महोत्सव के अध्यक्ष अशोक अगोनीज लक्ष्मणगढ सकल जैन समाज अध्यक्ष सुमेरचंद जैन द्वारा महोत्सव में पूर्ण सहयोग एवं समर्पित खंडेलवाल समाज के अध्यक्ष, मीडिया प्रभारी पत्रकार कमलेश जैन अविनाश खारवाल एवं मंदिर निर्माण में आर्थिक सहयोग करने वाले लोगों का शाल उडाकर स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया।
पंचकल्याणक महोत्सव के दौरान मुनि श्री ज्ञान भूषण जी महाराज का अपने प्रवचनो मे मुख्य रुप से भगवान के जन्म और उनके कल्याणकारी जीवन के पांच प्रमुख पलों पर केंद्रित रहा। मुनि श्री ने बताया कि तीर्थंकरों का आगमन संसार के दुखों को दूर करने और जीवों को सही मार्ग दिखाने वाला होता है।
गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष:
पांच कल्याणकों के माध्यम से मुनि श्री ने तीर्थंकर भगवान की जीवन यात्रा का वर्णन किया, जो हमें सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। मुनि श्री ने अपने प्रवचनों में जीवों पर दया, करुणा और अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म बताया उनके अनुसार, त्योहारों और आयोजनों का वास्तविक लाभ तभी है जब हम इन गुणों को अपने आचरण में उतारें।


