लक्ष्मणगढ़: आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में पर्यूषण पर्व का चौथा दिन, भक्तिभाव से मनाया गया 'उत्तम शौच धर्म'
लक्ष्मणगढ़ (अलवर) कमलेश जैन।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां इंसान के पास स्वयं के लिए समय निकालना मुश्किल हो गया है, वहीं जैन धर्म का दशलक्षण (पर्यूषण) पर्व समूचे वातावरण को तपोमय और भक्तिमय बना रहा है। इसी क्रम में शनिवार को कस्बे के ऐतिहासिक आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना एवं विधान के साथ दशलक्षण पर्व का चौथा दिन 'उत्तम शौच धर्म' के रूप में बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया।
आंतरिक शुचिता और संतोष का संदेश: उत्तम शौच धर्म के महत्व पर प्रकाश डालते हुए वक्ताओं और धर्म गुरुओं ने बताया कि आज का युग भौतिकता और उपभोगवाद का है, जहां मनुष्य केवल बाह्य स्वच्छता पर ध्यान देता है, लेकिन अंतरंग में लोभ, ईर्ष्या और असंतोष छुपा रहता है। जैन दर्शन में शौच का वास्तविक अर्थ केवल शरीर या परिवेश की सफाई नहीं, बल्कि मन व अंतःकरण की पवित्रता है। जब आत्मा राग, द्वेष, मोह और लोभ से मुक्त होती है, तभी सच्चा शौच धर्म प्रकट होता है।
उत्तम शौच धर्म के मुख्य सूत्र:
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संतोष व लोभ का त्याग: दूसरों के वैभव, यश व संपत्ति को देखकर ईर्ष्या न करना और जो प्राप्त है उसी में संतोष रखना।
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आभ्यंतर शुचिता: बाह्य स्वच्छता शरीर को स्वस्थ रखती है, लेकिन आंतरिक शुचिता आत्मा को मोक्ष का मार्ग दिखाती है।
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आत्मनिरीक्षण व स्वाध्याय: अपने दोषों को पहचानकर ध्यान और स्वाध्याय के माध्यम से आत्मा के शुद्ध स्वरूप का चिंतन करना।
आदिनाथ मंदिर में आयोजित विशेष पूजा-अर्चना के दौरान बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु उपस्थित रहे, जिन्होंने उत्तम शौच धर्म का पालन करते हुए जीवन में संतोष, संयम और मन की निर्मलता धारण करने का संकल्प लिया।

