बगड़ राजपूत में किसानों के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र की तरफ से समन्वित कीट प्रबंधन से सरसों की खेती की नई पहल

Oct 4, 2025 - 17:05
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बगड़ राजपूत  में किसानों के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र की तरफ से समन्वित कीट प्रबंधन से सरसों की खेती की नई पहल

रामगढ़ अलवर (राधेश्याम गेरा)

अलवर जिले के गांव बगड़ राजपूत में किसानों के लिए कृषि विज्ञान केंद्र अलवर-I और राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान  संस्थान नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय जैविक सरसों उत्पादन प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
 इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय किसानों ने भाग लिया और उन्होंने जैविक खेती तथा समन्वित कीट प्रबंधन इंटेग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट‌ की तकनीकों के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की।
समन्वित कीट प्रबंधन ( आईपीएम) पर विशेष ध्यान
विशेषज्ञों ने किसानों को समझाया कि समन्वित कीट प्रबंधन (आईपीएम) से फसल में होने वाले कीट और रोगों को नियंत्रित किया जा सकता है। इस तकनीक में रासायनिक कीटनाशकों के बजाय जैविक और पर्यावरण-अनुकूल उपायों का प्रयोग किया जाता है। आईपीएम तकनीक अपनाने से फसल अधिक रोगमुक्त रहती है, मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और पर्यावरण सुरक्षित रहता है।

ट्राइकोडरमा का महत्व और प्रयोग
किसानों को बताया गया कि ट्राइकोडरमा एक लाभकारी कवक है, जो मिट्टी में हानिकारक रोगजनकों को नष्ट करता है और फसल की जड़ों को स्वस्थ रखता है।
•    बीज उपचार में: ट्राइकोडरमा से बीज को उपचारित करने पर बीजजनित रोग नहीं लगते और अंकुरण बेहतर होता है।
•    मिट्टी उपचार में: खेत की मिट्टी में ट्राइकोडरमा मिलाने से जड़ सड़न, विल्ट और अन्य मिट्टीजनित रोगों से फसल सुरक्षित रहती है।
डॉ. रेखा (एनसीआईपीएम) ने किसानों को व्यावहारिक प्रदर्शन  के माध्यम से दिखाया कि बीज और मिट्टी में ट्राइकोडरमा का प्रयोग कैसे किया जाता है। इससे किसानों को तकनीक को व्यवहारिक रूप से अपनाने में आसानी हुई।
विशेषज्ञों और अधिकारियों की भूमिका
इस अवसर पर एनसीआईपीएम नई दिल्ली से डॉ. एम .एस. यादव और डॉ. रेखा उपस्थित रहे। वहीं किसान विकास केन्द्र अलवर-I के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. एस.सी. यादव, वैज्ञानिक डॉ. पूनम और डॉ. एच.आर. माली ने किसानों को मार्गदर्शन दिया।
डॉ. एस.सी. यादव ने कहा:- "जैविक खेती और आईपीएम तकनीक अपनाने से किसानों की आय बढ़ेगी और मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहेगी। यह तकनीक न केवल पर्यावरण सुरक्षित रखती है बल्कि रासायनिक नष्टकारी प्रभावों से भी बचाती है।"
डॉ. रेखा ने कहा:"ट्राइकोडरमा एक सरल, टिकाऊ और लागत कम करने वाला उपाय है। इसे नियमित रूप से अपनाने से फसल रोगमुक्त रहेगी और किसानों को रसायनों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।"
किसानों की प्रतिक्रिया और उत्साह
•    कन्हैयालाल  मीणा: “हमने पहली बार ट्राइकोडरमा का व्यावहारिक उपयोग देखा। अब हम इसे अपनी सरसों की फसल में अपनाएंगे।”
•    युवा कृषक अनिल ने कहा  “रासायनिक खेती में लागत अधिक होती थी। जैविक खेती अपनाने से न केवल फसल बेहतर होगी बल्कि हमें बाजार में भी अच्छा मूल्य मिलेगा।”
प्रशिक्षण के दीर्घकालिक लाभ
विशेषज्ञों ने बताया कि ट्राइकोडरमा आधारित जैविक खेती से:-
1.    उत्पादन लागत कम होगी।
2.    सरसों का दाना पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण होगा।
3.    बाजार मूल्य बेहतर मिलेगा।
4.    मिट्टी की उर्वरता और स्वास्थ्य लंबे समय तक सुरक्षित रहेगा।
5.    पर्यावरण संरक्षण में मदद मिलेगी।
किसानों ने प्रशिक्षण के बाद आगामी रबी सीज़न में ट्राइकोडरमा आधारित जैविक सरसों उत्पादन अपनाने का संकल्प लिया। इससे ग्राम बगड़ राजपूत में जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा और आसपास के गांवों के किसानों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनेगा।
ग्राम बगड़ राजपूत  ने जैविक खेती और समन्वित कीट प्रबंधन को अपनाकर किसानों की आय, मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की है। यह कदम न केवल इस गांव बल्कि पूरे क्षेत्र में जैविक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

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