भीड़ में आवाज सुनने से लेकर याददाश्त और अचानक खतरों से निपटने तक: आईआईटी जोधपुर की लैब डिकोड कर रही मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली
जोधपुर: भीड़-भाड़ वाले माहौल में किसी की आवाज सुनना अचानक क्यों मुश्किल हो जाता है? उम्र बढ़ने के साथ कुछ लोगों की याददाश्त तेज क्यों बनी रहती है, जबकि कुछ में भूलने की समस्या बढ़ती है? अनिश्चित परिस्थितियों में भावनाएं कैसे बदलती हैं और सड़क पर अचानक खतरे को देखकर मस्तिष्क पल भर में कैसे सतर्क हो जाता है? इन सभी जटिल सवालों के जवाब तलाशने का कार्य भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) जोधपुर की कॉग्निटिव ब्रेन डायनेमिक्स लैब (CBDL) में किया जा रहा है। स्कूल ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एंड डेटा साइंस के प्रोफेसर दीपांजन रॉय के नेतृत्व में यह प्रयोगशाला मानव मस्तिष्क के कार्य करने के तरीकों पर अत्याधुनिक शोध कर रही है।
शोर-शराबे में बातचीत और मस्तिष्कीय तरंगों का अध्ययन रोजमर्रा की जिंदगी में हम केवल सुनकर ही नहीं, बल्कि होठों की गतिविधियों और चेहरे के हाव-भाव से भी बात समझते हैं। आईआईटी जोधपुर के शोधकर्ताओं ने पाया है कि मस्तिष्क को हल्की विद्युत उत्तेजना (Electrical Stimulation) देकर यह प्रभावित किया जा सकता है कि वह सुनी और देखी गई जानकारी को कैसे जोड़े। 'ब्रेन वेव्स' (मस्तिष्कीय तरंगों) के अध्ययन से यह भी सामने आया कि कुछ विशेष तरंगें सुनने-समझने की क्षमता को बदलती हैं। यह शोध भविष्य में सुनने-बोलने में कठिनाई झेल रहे लोगों के लिए उन्नत सहायक उपकरण (Assistive Technologies) और आधुनिक श्रवण उपकरण विकसित करने में बेहद मददगार साबित होगा।
याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य पर फोकस बढ़ती बुजुर्ग आबादी के बीच याददाश्त में आने वाले बदलावों को समझने के लिए शोधकर्ता ईईजी (EEG), एमईजी (MEG) और आधुनिक कम्प्यूटेशनल तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। यह अध्ययन 'माइल्ड कॉग्निटिव इम्पेयरमेंट' (MCI) और डिमेंशिया जैसी उम्र से जुड़ी बीमारियों की शुरुआती पहचान में मददगार है। इसके अलावा, अवसाद, चिंता और ओसीडी जैसी मानसिक समस्याओं को समझने के लिए fMRI जैसी तकनीकों की मदद से वास्तविक जीवन जैसी परिस्थितियों पर शोध किया जा रहा है, जिससे प्रभावी जैविक संकेत (Neurocognitive Markers) पहचाने जा रहे हैं।
भविष्य की तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को आधार अचानक आने वाले खतरों और मस्तिष्कीय नेटवर्क पर किए जा रहे इन अध्ययनों से एडीएचडी (ADHD) जैसी समस्याओं के उपचार में भी मदद मिलेगी। प्रोफेसर दीपांजन रॉय का कहना है कि न्यूरोसाइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ब्रेन इमेजिंग तकनीकों को जोड़कर ऐसे वैज्ञानिक सिद्धांत विकसित किए जा रहे हैं, जो भविष्य में मानव स्वास्थ्य, याददाश्त और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाएंगे।

