लक्ष्मणगढ़ के 'दूसरा दशक' मॉडल के मुरीद हुए 20 देशों के प्रतिनिधि: कठूमर रोड पर सांस्कृतिक कार्यक्रम में हुए रूबरू, मॉडल को वैश्विक स्तर पर अपनाने पर मंथन
लक्ष्मणगढ़, अलवर (कमलेश जैन)
उपखंड क्षेत्र के कस्बों और सुदूर ग्रामीण अंचलों में 11 से 20 वर्ष के किशोर-किशोरियों की समग्र शिक्षा, जीवन कौशल विकास और सशक्तिकरण के लिए संचालित 'दूसरा दशक' परियोजना की सफलता का डंका अब वैश्विक मंच पर भी बजने लगा है। 'फाउंडेशन फॉर एजुकेशन एंड डेवलपमेंट' द्वारा वर्ष 2001 से चलाई जा रही इस अनूठी परियोजना की जमीनी सफलता, अभिनव शिक्षण पद्धतियों और आवासीय शिविर मॉडल का अध्ययन करने के लिए 20 से अधिक देशों के अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों और विशेषज्ञों ने क्षेत्र का दौरा किया।
सांस्कृतिक संध्या में स्थानीय संस्कृति से हुए रूबरू
कस्बे के कठूमर रोड स्थित आराध्या रिसोर्ट में आयोजित विशेष कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल का पारंपरिक स्वागत किया गया। प्रतिनिधियों ने इस अवसर पर आयोजित रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद लिया और स्थानीय नागरिकों, युवाओं तथा संवाददाताओं से आत्मीय बातचीत की।
अभिनव मॉडल और लैंगिक समानता का अध्ययन
विदेशी विशेषज्ञों ने विशेष रूप से अध्ययन किया कि राजस्थान जैसे रूढ़िवादी ग्रामीण परिवेश में यह परियोजना बाल विवाह जैसी कुरीतियों पर लगाम लगाने और लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने में किस प्रकार कारगर साबित हो रही है। इस मॉडल के जरिए ड्रॉप-आउट (स्कूल छोड़ चुके) और अति-वंचित वर्ग के किशोर-किशोरियों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने की प्रणाली को गहराई से समझा गया।
निरीक्षण के प्रमुख बिंदु एवं गतिविधियां
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आवासीय शिविरों का भ्रमण: प्रतिनिधियों ने ब्लॉक स्तर पर जाकर संचालित विशेष शिक्षा शिविरों का दौरा किया। उन्होंने देखा कि कैसे खेल-कूद, विज्ञान के प्रयोगात्मक सत्रों और लोकतांत्रिक मूल्यों के माध्यम से किशोरों में आत्मविश्वास जगाया जा रहा है।
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समुदाय के साथ सीधा संवाद: दल ने स्थानीय ग्राम सलाहकारों, महिला स्वयं सहायता समूहों, युवा शक्ति संगठनों और परियोजना के सहभागियों से सीधी बातचीत कर सामाजिक बदलाव की जमीनी हकीकत को समझा।
वैश्विक स्तर पर अपनाया जाएगा मॉडल
राजस्थान के इस 'दूसरा दशक' मॉडल की सफलता को देखते हुए न केवल भारत के अन्य राज्यों—जैसे बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के गैर-सरकारी संगठन (NGOs) इसे अपना रहे हैं, बल्कि कई विकासशील देश भी अपने यहां किशोर शिक्षा और सशक्तिकरण के लिए इसी रणनीति को लागू करने की योजना बना रहे हैं।
बिना भेदभाव सीमित संसाधनों में अनुकरणीय कार्य की सराहना
अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने बिना किसी भेदभावपूर्ण माहौल के और अत्यंत सीमित संसाधनों के बावजूद युवाओं को सामाजिक परिवर्तन का नेतृत्वकर्ता बनाने की इस पहल की मुक्तकंठ से सराहना की।

