अलवर में गूंजा 'महाराजा भर्तृहरि' नाटक का जादू: 'मोहिनी की महफिल' और पिंगला के श्रृंगार रस ने दर्शकों को किया मंत्रमुग्ध
अलवर (अनिल कुमार गुप्ता): श्री राजर्षि अभय समाज, अलवर के मंच पर पारसी शैली पर आधारित महान सामाजिक, धार्मिक एवं ऐतिहासिक नाटक 'महाराजा भर्तृहरि' का भव्य मंचन किया गया, जिसने दर्शकों को इतिहास के पन्नों में उतार दिया। नाटक के एक-एक दृश्य ने दर्शकों को हंसाया, गुदगुदाया और भावविभोर कर दिया।
प्रेम और श्रृंगार में डूबे महाराजा भर्तृहरि: नाटक के श्रृंगार शतक दृश्य में महारानी पिंगला की हिंडोल क्रीड़ा (झूला झूलने) का मनमोहक मंचन किया गया। दृश्य में महाराजा भर्तृहरि, महारानी पिंगला के प्रेम और सौंदर्य में इतने सुध-बुध खो बैठते हैं कि वे राजकाज चलाना भी भूल जाते हैं। राजा भर्तृहरि महारानी की प्रशंसा करते हुए उन्हें ग्रहों का पुंज तक कह डालते हैं। स्वयं न्यायधीश होने के बावजूद, श्रृंगार रस में डूबे राजा महारानी को ही न्यायाधीश की संज्ञा दे देते हैं और उनकी क्रीड़ा में विघ्न आने पर दंड का प्रावधान तक करवा बैठते हैं। अंत में राजा द्वारा महारानी को स्वयं झूला झुलाने और प्रेम में पूर्णतः समर्पित होने के दृश्य ने दर्शकों को पूरी तरह रोमांचित कर दिया।
'मोहिनी की महफिल' ने लूटी महफिल: नाटक का दूसरा सबसे बड़ा आकर्षण 'मोहिनी की महफिल' रहा। कथा के अनुसार, सेठ मायादास के मित्र चंद्रशेखर शास्त्री अपनी पुत्री मोहिनी को सेठ मायादास के सुपुर्द कर तपस्या करने चले जाते हैं। सेठ मायादास धन कमाने के लिए मोहिनी को नृत्यांगना बना देते हैं।
जब इस महफिल में क्रूरसिंह (गुरु गोरखनाथ) का प्रवेश होता है, तो वे मोहिनी के नृत्य और अपनी माया के प्रभाव से उस पर मोहित हो जाते हैं और उसे अपनी प्रेयसी बना लेते हैं। इस पूरे दृश्य के दौरान पात्रों—नैनसुख, लाला और पंडितजी—के बीच हुए शानदार और हास्य से भरपूर संवादों ने दर्शकों को लोटपोट कर दिया।
पारसी शैली के इस जीवंत मंचन और कलाकारों के बेहतरीन अभिनय ने अलवर के कला प्रेमियों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी।

