जल संरक्षण से ही सुरक्षित भविष्य: बाजारीकरण पर रोक और जनसहभागिता से ही बचेगा राजस्थान का कल
विशेष रिपोर्ट: राम भरोस मीणा
जयपुर। "रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून..."—कभी राजस्थान की जीवनशैली का मूल मंत्र हुआ करने वाला यह दोहा आज केवल किताबों तक सीमित रह गया है। हजारों वर्षों के सामाजिक अनुसंधान और अनुभवों से उपजी जिस जल संस्कृति की मिसाल अनुपम मिश्र जैसे जल योद्धाओं ने पूरी दुनिया में दी थी, उसे आज की युवा पीढ़ी महज़ दो दशकों में भुला चुकी है।
परिणाम अत्यंत भयानक हैं—पारंपरिक जल स्रोतों में से 92% पूरी तरह दम तोड़ चुके हैं, 5% अनुपयोगी हो गए हैं, और 2% कचरा पात्र में तब्दील हो चुके हैं। आज महज़ 1% जोहड़ों का जल ही उपयोग के लायक बचा है।
जोहड़ों के विनाश के मुख्य कारण:
-
अतिक्रमण और अवैध विकास: विकास के नाम पर बनाई जा रही अवैध कॉलोनियां, निजी रास्ते और अतिक्रमण।
-
बाजारूपन और औद्योगीकरण: भूगर्भीय जल का अंधाधुंध दोहन और मीठे पानी का उद्योगों में व्यावसायिक इस्तेमाल।
-
सामूहिक चेतना का अभाव: पारंपरिक श्रमदान, मानसून से पहले सफाई की परंपरा और सामाजिक सरोकार से युवाओं का पूरी तरह कट जाना।
जिस प्रदेश के गांवों और कस्बों में 1990 के दशक तक लगभग 60 से 70 हजार जोहड़ लबालब लहराते थे, जहां कुएं उफान मारते थे और पहाड़ों से झरने बहते थे, वहां मात्र तीन दशकों में पानी पाताल में चला गया है। आज स्थिति यह है कि आम नागरिक को पीने का शुद्ध पानी नसीब नहीं हो रहा, भूजल में जहरीले रसायन घुल रहे हैं और बच्चों में कुपोषण व स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं।
यदि अब भी औद्योगीकरण पर लगाम, औद्योगिक इकाइयों में मीठे पानी के इस्तेमाल पर प्रतिबंध और व्यापक वृक्षारोपण के साथ जल संरक्षण को जन-आंदोलन नहीं बनाया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब इंसान पानी की एक-एक बूंद को तरसेगा—ठीक वैसे ही, जैसे बीते एक दशक से राजस्थान के जोहड़ पानी को तरस रहे हैं।

