लिपिक भर्ती 2013 विवाद: फर्जी दस्तावेजों पर नौकरी पाने वालों पर गिरेगी गाज,1051 लिपिकों की नियुक्तियां जांच के दायरे में
जयपुर (कोशलेन्द्र दत्तात्रेय)
राजस्थान के पंचायती राज विभाग की वर्ष 2013 की लिपिक भर्ती एक बार फिर बड़े विवादों और कथित अनियमितताओं के कारण सुर्खियों में आ गई है। इस बहुचर्चित भर्ती में कुल 1051 नियुक्तियां सीधे तौर पर जांच के दायरे में आ गई हैं, जिससे प्रशासनिक गलियारों और कर्मचारियों में हड़कंप मच गया है।
संदिग्ध नियुक्तियों में सबसे ज्यादा मामले जयपुर, अलवर और भरतपुर जिलों से सामने आए हैं। प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, अकेले जयपुर में 560, अलवर में 302 और भरतपुर में 189 लिपिकों की नियुक्तियां संदिग्ध बताई जा रही हैं। इन अभ्यर्थियों पर फर्जी अनुभव प्रमाण-पत्र, संदिग्ध कंप्यूटर सर्टिफिकेट, निर्धारित कटऑफ से कम अंक होने और सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवैध घोषित ऑफ-कैंपस कंप्यूटर प्रमाण-पत्रों के आधार पर नौकरी हासिल करने के गंभीर आरोप हैं।
SOG जांच के आदेश और प्रशासनिक फेरबदल
इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए कार्मिक विभाग ने 6 जून 2024 को एसओजी (SOG) को गहन जांच करने के निर्देश दिए थे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि पंचायती राज विभाग ने इन निर्देशों को करीब 9 महीने की लंबी सुस्ती के बाद 24 मार्च 2025 को जिला परिषदों तक पहुंचाया।
अब स्थिति यह है कि पंचायती राज विभाग द्वारा जिला परिषदों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (CEOs) को इन संदिग्ध नियुक्तियों में सीधे सेवा समाप्ति (बर्खास्तगी) की कार्रवाई करने के निर्देश दिए जा रहे हैं।
कार्रवाई की निष्पक्षता पर उठ रहे गंभीर सवाल
विभाग के इस अचानक उठाए गए कदम के बाद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। उल्लेखनीय है कि पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने इसी वर्ष फरवरी माह में विधानसभा के भीतर इस पूरे प्रकरण की जांच एसओजी से कराने की घोषणा की थी। ऐसे में एसओजी जैसी निष्पक्ष जांच एजेंसी को दरकिनार कर सीधे प्रशासनिक स्तर पर बर्खास्तगी की तैयारी को लोग 'रसूखदारों और भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने का प्रयास' मान रहे हैं।
भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों पर भी कसेगा शिकंजा?
जानकारों का मानना है कि यदि इन लिपिकों के दस्तावेज वास्तव में फर्जी पाए जाते हैं, तो यह केवल उन कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भर्ती प्रक्रिया के दौरान इन फर्जी दस्तावेजों की अनदेखी करने वाले और मिलीभगत रखने वाले विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी सीधे तौर पर जांच के घेरे में आ जाएगी।
यदि इस मामले की निष्पक्ष एसओजी जांच नहीं होती है, तो भर्ती में पर्दे के पीछे से भ्रष्टाचार और गड़बड़ी करने वाले बड़े अधिकारियों के चेहरे कभी सामने नहीं आ पाएंगे और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का रास्ता हमेशा के लिए बंद होने की आशंका है। फिलहाल, इस कार्रवाई के बाद से महकमे में भारी तनाव और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।

