पर्यूषण पर्व के आठवें दिन दसलक्षण महापर्व पर उत्तम त्याग धर्म की आराधना
लक्ष्मणगढ़ (अलवर/कमलेश जैन) श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित पर्यूषण पर्व के आठवें दिन धर्म के दसलक्षण उत्तम त्याग दिवस की पूजा की गई। णमोकार महामंत्र का पाठ किया गया। आज की गई शांति धारा के पुण्यार्जक सुमत चंद्र जैन को बनाया गया।
इस मौके पर मानक चंद जैन ने श्रद्धालुओं को उत्तम त्याग धर्म का महत्व बताया। कहा कि उत्तम त्याग का तात्पर्य परिग्रह रहित होना है। त्याग की अलग-अलग परिभाषा होती है। कहीं हम बड़ी वस्तु का त्याग अल्प समय के लिए करते हैं तो कहीं आजीवन। त्याग किसी व्यक्ति के लिए महान बनाता है। बुरी आदतों का पूरे जीवन के लिए त्याग करना चाहिए और अच्छी आदतों को आत्मसात करना चाहिए।
आवश्कता से अधिक धन संग्रह न करना जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओ के अतिरिक्त अन्य का त्याग करना अच्छे कर्मो को करना ही त्याग धर्म है। ऐसे कर्म करने से उत्तम त्याग की प्राप्ति होती है।
आवश्यकता है, श्रम दान , समय दान आदि । आज लोग धार्मिक कार्य के लिए पैसा जितना चाहे देने को तैयार हैं। किन्तु समय और श्रम देना बहुत मुश्किल हो रहा है । इसलिए भलाई के काम में जो धन नहीं दे पा रहा है किन्तु समय दे रहा है और ईमानदारी से श्रम कर रहा है वह भी उस पुण्य का उतना ही हकदार है, जितना धन देने वाला । त्याग और दान, अहंकार और बदले की भावना से नहीं करना चाहिये ।
त्याग के बिना मनुष्य की शोभा नहीं होती।
भोग विलास की चीजों और क्रोध, मान, माया, लोभ का त्याग सबसे बड़ा माना गया है और महत्वपूर्ण भी ।त्याग करने से लोभ और मोह कम होता है । राग द्वेष से अपने को छुड़ाने का नाम त्याग है। त्याग और दान का सही प्रायोजन तभी सिद्ध होता है जब हम जिस चीज का त्याग कर रहे हैं या दान कर रहे हैं उसके प्रति हमारे मन में किसी प्रकार का मोह या मान सम्मान पाने का लोभ न हो।
दान और त्याग में फर्क यह है की दान अपने लिये थोड़ा रख कर, थोड़ा दिया जाता है, जबकि त्याग में पूरा का पूरा छोड़ा जाता है ।
दान दूसरे की अपेक्षा से दिया जाता है, त्याग किसी की अपेक्षा से नहीं सिर्फ वस्तु को छोड़ा जाता है ।
आचार्यों ने कहा है कि सुपात्र को दिया दान-परम्परा से मुक्ति का कारण है। कुपात्र को दिया दान—कर्मबंध का कारण है, संसार को बढ़ाने वाला है। लेकिन वांछा से रहित दान, कर्मक्षय का कारण है। उत्तम त्याग धर्म-भव बंधन से छुड़ाने वाला, मुक्ति का सोपान है।
हम सभी को अपनी-अपनी शक्ति अनुसार दान के भावों में प्रवृत्ति करते हुये उत्तम त्याग धर्म को धारण करे और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हों ।

