आधुनिकता बनाम परंपरा: फैंसी लाइटों के बढ़ते चलन के बावजूद, धार्मिक व सांस्कृतिक दृष्टि से मिट्टी के दीयों का विशेष महत्व बरकरार
राजगढ़ (अलवर) अनिल कुमार गुप्ता
रोशनी के पर्व की तैयारियाँ: राजगढ़ में चाक पर ढलने लगे उम्मीदों के दीये, जयपुर और अलवर तक बढ़ी माँग
राजगढ़ (अलवर)। दीपावली का पावन त्योहार नज़दीक आते ही राजगढ़ कस्बे में कुंभकार रात-दिन मिट्टी के दीपक बनाने में जुट गए हैं। आधुनिक दौर में भले ही घरों को सजाने के लिए चाइनीज व रंग-बिरंगी फैंसी लाइटों का प्रचलन बढ़ा हो, लेकिन सनातन परंपरा और पूजा-विधान में मिट्टी के दीपकों का स्थान आज भी अनूठा है। दीपावली पर घर-आंगन को मिट्टी के दीयों की पावन रोशनी से जगमगाने का उत्साह हर तरफ सिर चढ़कर बोल रहा है।
शहर से लेकर गाँव-ढाणी तक बढ़ी माँग
हिंदू धर्म के इस सबसे बड़े त्योहार को लेकर पूरे क्षेत्र में हर्षोल्लास का माहौल है। दीपावली पूजन से लेकर कार्तिक मास के दीपदान तक मिट्टी के दीयों की माँग शहर से लेकर गाँव और ढाणी-ढाणी तक चरम पर पहुँच जाती है।
राजगढ़ के दीयों की जयपुर तक धूम
स्थानीय कुंभकार ओमप्रकाश प्रजापत ने बताया कि दीपावली से हफ़्तों पहले ही वे मिट्टी के विभिन्न प्रकार के दीपक तैयार करने में लग जाते हैं। उन्होंने बताया कि राजगढ़ में बने मिट्टी के दीपकों की गुणवत्ता बेहतरीन होने के कारण कस्बे के अलावा अलवर शहर, जयपुर तथा आसपास के अन्य बड़े बाज़ारों से भारी संख्या में ऑर्डर मिल रहे हैं, जहाँ ये बिकने के लिए भेजे जाते हैं।
पारंपरिक कला को मिला नया जीवन
कुंभकारों का कहना है कि पिछले दो वर्षों में आम जनता का रुझान एक बार फिर पारंपरिक और पर्यावरण-अनुकूल मिट्टी के दीपकों की ओर तेजी से बढ़ा है। खरीदारी में आई इस एकाएक बढ़ोतरी से स्थानीय कारीगरों के चेहरों पर खुशी की चमक देखी जा सकती है।

