प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व हरियाली अमावस्या 12 अगस्त को: सावन में शिव पूजन, पितृ तर्पण और पौधरोपण का विशेष महत्व
प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व हरियाली अमावस्या 12 अगस्त को, पौधरोपण और शिव-पितृ पूजन का विशेष महत्व
लक्ष्मणगढ़, अलवर(कमलेश जैन)। सावन मास में जब चारों ओर रिमझिम वर्षा के साथ धरती पर हरियाली की चादर बिछ जाती है, तब आने वाली हरियाली अमावस्या धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति संरक्षण का पावन संदेश देती है। इस वर्ष हरियाली अमावस्या 12 अगस्त (बुधवार) को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाएगी।
प्रकृति, पितरों और ईश्वर के प्रति आभार का पर्व पंचांगकर्ता एवं योग शिक्षक पंडित लोकेश कुमार के अनुसार, हरियाली अमावस्या केवल एक धार्मिक तिथि नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति में प्रकृति, पितरों और परमपिता परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महापर्व है। सनातन परंपरा में प्रकृति को मात्र संसाधन न मानकर जीवनदायिनी शक्ति के रूप में पूजा गया है।
पौधरोपण का विशेष पुण्यकाल पंडित लोकेश कुमार ने बताया कि सावन में पर्याप्त वर्षा होने के कारण यह मौसम नए पौधों के पनपने के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है। हरियाली अमावस्या के दिन पीपल, बरगद, नीम, आंवला और बेलपत्र जैसे छायादार व औषधीय पौधे लगाना अत्यंत पुण्यकारी होता है।
शिव आराधना और पितृ तर्पण की परंपरा सावन का पवित्र महीना होने के कारण इस अमावस्या पर भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु इस दिन शिवलिंग पर जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक कर बेलपत्र और पुष्प अर्पित करते हैं। इसके साथ ही, अमावस्या तिथि होने के कारण पितरों की आत्मशांति के लिए तर्पण, श्राद्ध कर्म और दान-पुण्य करने का भी विशेष विधान है।
दिन की शुरुआत की शास्त्रीय विधि पंडित के अनुसार हरियाली अमावस्या के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य देकर दिन की शुरुआत करनी चाहिए। इसके पश्चात भगवान शिव का ध्यान और मंत्र जाप करें। अंत में पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक तर्पण कर जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र का दान दें और कम से कम एक पौधा अवश्य रोपें।

