भरतपुर में ₹90.12 करोड़ की 17 भूमिगत विद्युत परियोजनाएं ठप: अंतर-विभागीय समन्वय की कमी से अटका काम; समृद्ध भारत अभियान ने पारदर्शी समीक्षा की उठाई मांग
भरतपुर (विष्णु मित्तल) |
भरतपुर शहर को बिजली के तारों और खंभों के जाल से मुक्ति दिलाने के मकसद से शुरू की गई ₹90.12 करोड़ की 17 भूमिगत विद्युत परियोजनाएं प्रशासनिक लापरवाही और अंतर-विभागीय तालमेल की कमी के कारण अधर में लटक गई हैं। भरतपुर विकास प्राधिकरण (BDA) द्वारा संचालित इन अधिकांश परियोजनाओं की निर्धारित पूर्णता तिथियां (15 व 19 सितंबर 2026) बीत जाने के बावजूद काम पूरा होना तो दूर, कई जगह तो नींव भी नहीं रखी जा सकी है।
अतिक्रमण, अनापत्ति प्रमाण पत्र और तालमेल की कमी बनी बाधा
रिपोर्ट के अनुसार, शहर के प्रमुख मार्गों पर विकास कार्य विभागों की आपसी खींचतान में फंसे हैं:
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सारस चौराहे से बिजलीघर (€3.13 करोड़): सड़क के क्रॉस सेक्शन डिजाइन की वजह से काम लंबित है।
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कुम्हेर गेट से कंजोली (€6.11 करोड़): ड्रेन और नाली निर्माण की अनुमति/डिजाइन न मिलने से काम शुरू नहीं हो सका।
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आरबीएम हॉस्पिटल से रीको रोड (€5.24 करोड़): सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी न करने से काम ठप है।
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रेडक्रॉस सर्किल से चांदपोल गेट (€4.45 करोड़): सड़क पर फैले भारी अतिक्रमण के कारण निर्माण आगे नहीं बढ़ सका।
इसके अतिरिक्त, सुजान गंगा नहर क्षेत्र की परियोजना महज 30%, मानसिंह सर्किल-होटल द बाग मार्ग 15% और हीरादास बस स्टैंड-मथुरा बाईपास सड़क का काम केवल 40% ही पूरा हो सका है।
₹1,000 करोड़ का कर्ज, धन और समय की बर्बादी पर उठे सवाल
समृद्ध भारत अभियान के निदेशक सीताराम गुप्ता ने स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान में भरतपुर विकास प्राधिकरण पर लगभग ₹650 करोड़ और नगर निगम पर ₹350 करोड़, यानी कुल मिलाकर करीब ₹1,000 करोड़ का भारी वित्तीय ऋण है। यह सीधे तौर पर जनता के पैसे का मामला है।
उन्होंने आरोप लगाया कि शीशम तिराहा–हीरादास–सरसों अनुसंधान केंद्र परियोजना (लागत ₹10.10 करोड़) में कागजों पर 95% प्रगति दिखाई गई है, लेकिन धरातल पर पुरानी बिजली लाइनों को हटाना तक भूल गए। यह पूर्व-नियोजन पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। उन्होंने मांग की है कि अब सिर्फ बहाने बनाने के बजाय जवाबदेह अधिकारियों के नाम तय कर नई अंतिम समयसीमा घोषित की जानी चाहिए।

