भरतपुर में राई-सरसों वैज्ञानिकों की राष्ट्रीय बैठक का शुभारंभ; उत्पादकता एवं गुणवत्ता बढ़ाकर खाद्य तेलों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर जोर

Aug 17, 2026 - 19:37
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भरतपुर में राई-सरसों वैज्ञानिकों की राष्ट्रीय बैठक का शुभारंभ; उत्पादकता एवं गुणवत्ता बढ़ाकर खाद्य तेलों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर जोर

भरतपुर, (विष्णु मित्तल)देश में राई-सरसों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में सुधार तथा उत्पादन क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से संचालित अनुसंधान कार्यक्रमों की प्रगति की समीक्षा और भावी अनुसंधान प्राथमिकताओं के निर्धारण के लिए राई-सरसों की अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना की वार्षिक समूह की दो दिवसीय बैठक का सोमवार को भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान, सेवर के आयोजन में स्थानीय होटल में शुभारंभ हुआ। 
शुभारंभ समारोह को संबाधित करते हुए सचिव, डेयरी एवं महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद डॉ. मांगी लाल जाट ने कहा कि देश में खाद्य तेलों की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए राई-सरसों की उत्पादकता में वृद्धि करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सरसों की उत्पादकता बढ़ाकर ही देश को खाद्य तेलों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की जा सकती है। उन्होंने ओरोबैंकी, तना गलन तथा अधिक तापमान के प्रति सहनशीलता जैसी प्रमुख समस्याओं के प्रति प्रतिरोधी किस्मों के विकास पर विशेष जोर दिया।
उन्होंने वैज्ञानिकों से ऐसी उन्नत किस्मों एवं उत्पादन तकनीकों के विकास का आव्हान किया, जो अधिक उत्पादकता के साथ बेहतर गुणवत्ता, रोग एवं कीट प्रतिरोध तथा बदलती जलवायु परिस्थितियों में स्थिर प्रदर्शन प्रदान कर सकें। साथ ही प्री-ब्रीडिंग, फसल प्रणाली एवं प्रभावी तकनीकी हस्तांतरण को अनुसंधान कार्यक्रमों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की आवश्यकता बताई।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. देवेर कुमार यादव ने उन्नत किस्मों के विकास में जैव-प्रौद्योगिकी की नवीनतम तकनीकों के प्रभावी उपयोग पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि वर्तमान में ऐसी नवीन किस्में उपलब्ध हैं, जिनमें सफेद रतुआ प्रतिरोधकता के साथ-साथ कम इरूसिक अम्ल एवं कम ग्लूकोसिनोलेट जैसे महत्वपूर्ण गुणवत्ता गुण मौजूद हैं। आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी उपकरणों को पारंपरिक पादप प्रजनन के साथ समन्वित कर रोग प्रतिरोधी, उच्च उत्पादकता एवं बेहतर गुणवत्ता वाली किस्मों के विकास को गति दी जा सकती है।
सहायक महानिदेशक (तिलहन एवं दलहन) डॉ. एस.के. झा ने विभिन्न फसल सुधार कार्यक्रमों के समन्वय एवं अनुसंधान प्राथमिकताओं पर प्रकाश डाला। सहायक महानिदेशक (बीज) डॉ. पी.आर. चौधरी ने गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता तथा उन्नत किस्मों के प्रभावी बीज उत्पादन एवं प्रसार के महत्व की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उन्नत किस्मों की आनुवंशिक क्षमता का किसानों तक वास्तविक लाभ पहुंचाने के लिए गुणवत्तापूर्ण बीज की समय पर उपलब्धता अत्यंत आवश्यक है।
पूर्व राष्ट्रीय प्रोफेसर डॉ. एस.एस. बांगा ने राई-सरसों में जीन-एडिटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग से अधिक उत्पादकता एवं वांछित गुणों वाली किस्मों के विकास की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आधुनिक जीनोमिक एवं जीन-एडिटिंग तकनीकें भविष्य में फसल सुधार कार्यक्रमों को नई दिशा प्रदान कर सकती हैं।
अनुसंधान एवं तकनीकी हस्तांतरण को मिलेगा बढ़ावा
बैठक के दौरान अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई। भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान की स्पीड ब्रीडिंग सुविधा में अनुसंधान के लिए संस्थान तथा कामदेवगिरी क्रॉप साइंस प्राइवेट लिमिटेड के बीच करार किया गया। इसके साथ ही संस्थान की बीपीएम-11 एवं एनआरसीएचबी-101 किस्मों के प्रयोग के लाइसेंस के लिए क्रोपांटा महालक्ष्मी बायोसाइंस प्राइवेट लिमिटेड, गुजरात के साथ भी समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इन समझौतों को अनुसंधान, नवाचार एवं निजी क्षेत्र के साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इस अवसर पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. देवेर कुमार यादव, सहायक महानिदेशक (तिलहन एवं दलहन) डॉ. एस.के. झा, सहायक महानिदेशक (बीज) डॉ. पी.आर. चौधरी तथा भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. विजय वीर सिंह ने मीडिया प्रतिनिधियों से संवाद किया। उन्होंने बैठक के उद्देश्यों, राई-सरसों अनुसंधान की वर्तमान प्राथमिकताओं एवं भविष्य की अनुसंधान रणनीतियों की जानकारी दी।
दो दिवसीय बैठक में राई-सरसों की उन्नत किस्मों एवं संकरों के प्रदर्शन, अनुसंधान उपलब्धियों, उत्पादकता एवं गुणवत्ता सुधार, रोग एवं कीट प्रतिरोध, जलवायु अनुकूलन, आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी तथा आगामी अनुसंधान प्राथमिकताओं पर गहन वैज्ञानिक मंथन किया जाएगा। बैठक में लिए जाने वाले वैज्ञानिक निर्णय एवं अनुशंसाएं देश में राई-सरसों उत्पादन को नई दिशा देने के साथ खाद्य तेलों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के राष्ट्रीय लक्ष्य को गति प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

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