खैरथल के चुनावी रण में 'जिले' की हुंकार: पहचान और विकास के मुद्दे पर घिरे दल, निर्दलीयों ने बिगाड़ा खेल
खैरथल (हीरालाल भूरानी)। खैरथल नगर परिषद चुनाव की जंग अब अपने चरम पर पहुंच चुकी है। 'जी एक्सप्रेस' की ग्राउंड रिपोर्ट में शहर के नागरिकों, व्यापारियों और प्रबुद्धजनों से बातचीत के दौरान यह साफ हो गया है कि इस बार चुनाव सिर्फ स्थानीय मुद्दों का नहीं, बल्कि 'जिले की पहचान' का बन चुका है। खैरथल नाम की पहचान से किसी भी तरह की छेड़छाड़ शहरवासियों को बर्दाश्त नहीं है, और यही मुद्दा चुनावी हवा का रुख तय कर रहा है।
जिले का दर्जा और विकास का हिसाब नागरिकों का स्पष्ट कहना है कि खैरथल को जिले का दर्जा मिलने से क्षेत्र को एक नई पहचान मिली है, जिसमें किसी भी प्रकार की बदलाव की आशंका स्वीकार्य नहीं होगी। इसके साथ ही, मतदाता पिछले कार्यकाल के विकास कार्यों का हिसाब भी मांग रहे हैं। सड़क, सफाई, नालियों का निर्माण और स्ट्रीट लाइट जैसी मूलभूत सुविधाओं पर जनता खुलकर अपनी राय रख रही है। चुनावी चर्चाओं में इस बार हाइब्रिड फॉर्मूले पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
दलों की चिंता और निर्दलीयों की चुनौती राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के प्रति कुछ वर्गों में नाराजगी नजर आ रही है, वहीं जिले के मुद्दे को लेकर कांग्रेस के प्रति जनता का सकारात्मक रुझान देखा जा रहा है। हालांकि, कांग्रेस के सामने स्थानीय संगठन को एकजुट रखने और मजबूत नेतृत्व की चुनौती बरकरार है।
पिछली बार अधिक सीटें न होने के बावजूद जिस तरह भाजपा ने बोर्ड बनाया था, उसकी चर्चा इस बार भी सियासी गलियारों में गरम है। वहीं कई वार्डों में भाजपा और कांग्रेस के टिकटों से असंतुष्ट होकर मैदान में उतरे निर्दलीय प्रत्याशियों ने मुख्य दलों के समीकरण पूरी तरह बिगाड़ दिए हैं, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय और बेहद दिलचस्प हो गया है।
फैसले की घड़ी अब देखना यह होगा कि खैरथल की जनता जिले की अस्मिता, शहर के विकास और बेहतर नेतृत्व के सवाल पर किसके पक्ष में मतदान करती है। सिर्फ सीटों का आंकड़ा ही नहीं, बल्कि चुनाव बाद का राजनीतिक प्रबंधन ही तय करेगा कि नगर परिषद की अगली सत्ता किसके सिर सजेगी।

